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न जिसका नाम है कोई
न जिसका नाम है कोई न जिस की शक्ल है कोई, इक ऐसी शय का क्यूँ हमें अज़ल से इंतिज़ार है| शहरयार
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हर एक दिल फ़िगार है!
हर एक जिस्म रूह के अज़ाब से निढाल है, हर एक आँख शबनमी हर एक दिल फ़िगार है| शहरयार
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ग़ुबार ही ग़ुबार है!
ये क्या जगह है दोस्तो ये कौन सा दयार है, हद-ए-निगाह तक जहाँ ग़ुबार ही ग़ुबार है| शहरयार
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दरिया उतर गया यारो!
भटक रही थी जो कश्ती वो ग़र्क़-ए-आब हुई, चढ़ा हुआ था जो दरिया उतर गया यारो| शहरयार
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हर नक़्श तमन्ना का!
हर एक नक़्श तमन्ना का हो गया धुँधला, हर एक ज़ख़्म मिरे दिल का भर गया यारो| शहरयार
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निर्विकल्प!
आज शायद पहली बार मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तारसप्तक’ के एक प्रमुख हिन्दी कवि स्वर्गीय भारत भूषण अग्रवाल जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| उनको अपनी रचनाओं के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित अनेक सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हुए थे| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत भूषण अग्रवाल जी की यह कविता…
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हुस्न की दहशत अजब
हुस्न की दहशत अजब थी वस्ल की शब में ‘मुनीर’, हाथ जैसे इंतिहा-ए-शौक़ से शल हो गया| मुनीर नियाज़ी