-
मशवरा नहीं देंगे!
शराब पी के बड़े तजरबे हुए हैं हमें, शरीफ़ लोगों को हम मशवरा नहीं देंगे| राहत इंदौरी
-
वो रास्ता नहीं देंगे!
रिवायतों की सफ़ें तोड़कर बढ़ो वर्ना, जो तुम से आगे हैं वो रास्ता नहीं देंगे| राहत इंदौरी
-
हम सदा नहीं देंगे!
हमें तो सिर्फ़ जगाना है सोने वालों को, जो दर खुला है वहाँ हम सदा नहीं देंगे| राहत इंदौरी
-
ज़मीं को दग़ा नहीं देंगे!
हों लाख ज़ुल्म मगर बद-दुआ‘ नहीं देंगे, ज़मीन माँ है ज़मीं को दग़ा नहीं देंगे| राहत इंदौरी
-
इल्तिजाएँ करने लगे!
झुलस रहे हैं यहाँ छाँव बाँटने वाले, वो धूप है कि शजर इल्तिजाएँ करने लगे| राहत इंदौरी
-
ख़ताएँ करने लगे!
ज़मीं पर आ गए आँखों से टूट कर आँसू, बुरी ख़बर है फ़रिश्ते ख़ताएँ करने लगे| राहत इंदौरी
-
ज़मीं पर इक सूरज!
लहू-लुहान पड़ा था ज़मीं पर इक सूरज, परिंदे अपने परों से हवाएँ करने लगे| राहत इंदौरी
-
एक दिन!
आज मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| कविता स्वयं ही अपना और किसी हद तक अपने रचयिता का परिचय देती है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की यह कविता – एक दिनपृथ्वी पर जन्मेअसंख्य लोगों की तरहमिट जाऊंगा…
-
अब दवाएँ करने लगे!
तरक़्क़ी कर गए बीमारियों के सौदागर, ये सब मरीज़ हैं जो अब दवाएँ करने लगे| राहत इंदौरी