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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 16th Jul 2023

    बा-ख़ुदा मिलता नहीं!

    कश्ती-ए-दिल की इलाही बहर-ए-हस्ती में हो ख़ैर, नाख़ुदा मिलते हैं लेकिन बा-ख़ुदा मिलता नहीं| अकबर इलाहाबादी

  • 16th Jul 2023

    अपना पता मिलता नहीं

    मा‘रिफ़त ख़ालिक़ की आलम में बहुत दुश्वार है, शहर-ए-तन में जबकि ख़ुद अपना पता मिलता नहीं| अकबर इलाहाबादी

  • 16th Jul 2023

    सिरा मिलता नहीं!

    फ़लसफ़ी को बहस के अंदर ख़ुदा मिलता नहीं, डोर को सुलझा रहा है और सिरा मिलता नहीं| अकबर इलाहाबादी

  • 16th Jul 2023

    लता!

    आज एक बार फिर मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित सप्तकों में से एक महिला कवि की रचना शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीया कीर्ति चौधरी जी की ‘तीसरा सप्तक’ में शामिल एक कविता आज प्रस्तुत है| कीर्ति जी की इस कविता में पुष्पगुच्छों से युक्त एक लता के प्रति सहज आकर्षण का चित्रण किया गया है|…

  • 15th Jul 2023

    बातें जो तुम बनाते हो!

    कहा जो हाल-ए-दिल अपना तो उस ने हँस हँस कर, कहा ”ग़लत है ये बातें जो तुम बनाते हो”| नज़ीर अकबराबादी

  • 15th Jul 2023

    दर से क्यूँ उठाते हो!

    कहा जो हम ने ”हमें दर से क्यूँ उठाते हो”, कहा कि ”इस लिए तुम याँ जो ग़ुल मचाते हो’| नज़ीर अकबराबादी

  • 15th Jul 2023

    ऐसे दीवाने को हम!

    बाग़ में लगता नहीं सहरा से घबराता है दिल, अब कहाँ ले जा के बैठें ऐसे दीवाने को हम| नज़ीर अकबराबादी

  • 15th Jul 2023

    क्या ख़ुदाई रह गई!

    ताक़-ए-अबरू में सनम के क्या ख़ुदाई रह गई, अब तो पूजेंगे उसी काफ़िर के बुत-ख़ाने को हम| नज़ीर अकबराबादी

  • 15th Jul 2023

    आब और दाने को हम!

    हमको फँसना था क़फ़स में क्या गिला सय्याद का, बस तरसते ही रहे हैं आब और दाने को हम| नज़ीर अकबराबादी

  • 15th Jul 2023

    ग़म खाने को हम!

    क्यूँ नहीं लेता हमारी तू ख़बर ऐ बे-ख़बर, क्या तिरे आशिक़ हुए थे दर्द-ओ-ग़म खाने को हम| नज़ीर अकबराबादी

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