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मुझ में इक बच्चा!
कितनी आसानी से दुनिया की गिरह खोलता है, मुझ में इक बच्चा बुज़ुर्गों की तरह बोलता है| राजेश रेड्डी
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मुक्त कर दो मुझे – रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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यात्रा प्रारंभ!
मैं पणजी, गोवा में रहता हूँ और यहाँ से सामान्यतः अपनी ब्लॉग पोस्ट लिखता हूँ| कल मैं लंदन के लिए रवाना हो रहा हूँ और एक माह से अधिक समय तक वहाँ रहूँगा| मैं पहले भी दो बार लंदन में अपने बेटे के घर रहा हूँ और वहाँ से कुछ ट्रैवल ब्लॉग्स लिखे हैं, मुझे…
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सजाए फिरते थे!
सजाए फिरते थे झूटी अना जो चेहरों पर, वो लोग क़स्र-ए-सिकंदर में जा के लेट गए| मुनव्वर राना
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दर में जा के लेट गए!
तमाम उम्र जो निकले न थे हवेली से, वो एक गुम्बद-ए-बे-दर में जा के लेट गए| मुनव्वर राना
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मौत से डराते हैं!
ये बेवक़ूफ़ उन्हें मौत से डराते हैं, जो ख़ुद ही साया-ए-ख़ंजर में जा के लेट गए| मुनव्वर राना
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न जाने कैसी थकन थी
न जाने कैसी थकन थी कभी नहीं उतरी, चले जो घर से तो दफ़्तर में जा के लेट गए| मुनव्वर राना
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हमारी तिश्ना-नसीबी!
हमारी तिश्ना-नसीबी का हाल मत पूछो, वो प्यास थी कि समुंदर में जा के लेट गए| मुनव्वर राना