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आँख मिला कर देख!
तुझसे बिछड़ कर क्या हूँ मैं अब बाहर आ कर देख, हिम्मत है तो मेरी हालत आँख मिला कर देख| मुनीर नियाज़ी
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अन-कहे सवाल की!
देख के मुझ को ग़ौर से फिर वो चुप से हो गए, दिल में ख़लिश है आज तक इस अन-कहे सवाल की| मुनीर नियाज़ी
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उस परी-जमाल की!
उम्र के साथ अजीब सा बन जाता है आदमी, हालत देख के दुख हुआ आज उस परी-जमाल की| मुनीर नियाज़ी
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मेरे किसी ख़याल की!
शाम झुकी थी बहर पर पागल हो कर रंग से, या तस्वीर थी ख़्वाब में मेरे किसी ख़याल की| मुनीर नियाज़ी
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दहशत थी भौंचाल की!
शहर में डर था मौत का चाँद की चौथी रात को, ईंटों की इस खोह में दहशत थी भौंचाल की| मुनीर नियाज़ी
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रंगत फीकी पड़ गई!
महक अजब सी हो गई पड़े पड़े संदूक़ में, रंगत फीकी पड़ गई रेशम के रूमाल की| मुनीर नियाज़ी
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यही सदा घड़ियाल की!
आई है अब याद क्या रात इक बीते साल की, यही हवा थी बाग़ में यही सदा घड़ियाल की| मुनीर नियाज़ी
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चार पहर से पहले!
जी बहलता ही नहीं अब कोई साअ‘त कोई पल, रात ढलती ही नहीं चार पहर से पहले| इब्न-ए-इंशा
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घबराए न तरसे पहले!
इश्क़ पहले भी किया हिज्र का ग़म भी देखा, इतने तड़पे हैं न घबराए न तरसे पहले| इब्न-ए-इंशा