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तुम कहाँ हो!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी काव्य मंचों पर अपनी तरह की अलग रचनाएं एक अनूठे अंदाज़ में प्रस्तुत करने वाले स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| रंग जी की प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं- आब ओ दाना रहे, रहे न रहे, ये ज़माना रहे, रहे न रहे तेरी महफ़िल…
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रंग-ए-कलाम कहाँ!
दिल पे जो बीते सह लेते हैं अपनी ज़बाँ में कह लेते हैं, ‘इंशा’-जी हम लोग कहाँ और ‘मीर’ का रंग-ए-कलाम कहाँ| इब्न-ए-इंशा
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पलभर चमके डूब गए
साँझ-समय कुछ तारे निकले पल-भर चमके डूब गए, अम्बर अम्बर ढूँढ रहा है अब उन्हें माह-ए-तमाम कहाँ| इब्न-ए-इंशा
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हम जंगल के जोगी!
हम जंगल के जोगी हम को एक जगह आराम कहाँ, आज यहाँ कल और नगर में सुब्ह कहाँ और शाम कहाँ| इब्न-ए-इंशा
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आलम एक शहीद!
हाँ उसने झलकी दिखलाई एक ही पल को दरीचे में, जानो इक बिजली लहराई आलम एक शहीद हुआ| इब्न-ए-इंशा
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दर्द शदीद हुआ!
आन के इस बीमार को देखे तुझको भी तौफ़ीक़* हुई, लब पर उसके नाम था तेरा जब भी दर्द शदीद** हुआ| *हिम्मत , **तेज इब्न-ए-इंशा
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कब ना-उम्मीद हुआ!
आज तो जानी रस्ता तकते शाम का चाँद पदीद हुआ*, तूने तो इंकार किया था दिल कब ना-उम्मीद हुआ| *उदित हो गया इब्न-ए-इंशा
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ताबिश में ख़ुर्शीद हुआ!
देख हमारी दीद के कारन कैसा क़ाबिल-ए-दीद हुआ, एक सितारा बैठे बैठे ताबिश में ख़ुर्शीद* हुआ| *तपते-तपते सूरज बन गया इब्न-ए-इंशा
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सांझ!
आज मैं हिन्दी के प्रसिद्ध व्यंग्यकार स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ त्यागी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| त्यागी जी ने व्यंग्य लेखन के क्षेत्र में तो विशेष ख्याति प्राप्त की ही थी, उन्होंने बहुत सी सुंदर कविताएं भी लिखी थीं| त्यागी जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत…