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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 23rd Mar 2024

    हाथ भी रक्खे कानों पर

    उस का क्या मन-भेद बताऊँ उस का क्या अंदाज़ कहूँ, बात भी मेरी सुनना चाहे हाथ भी रक्खे कानों पर| जाँ निसार अख़्तर

  • 23rd Mar 2024

    जाने किस का नाम!

    सस्ते दामों ले तो आते लेकिन दिल था भर आया, जाने किस का नाम खुदा था पीतल के गुल-दानों पर| जाँ निसार अख़्तर

  • 23rd Mar 2024

    मेरे जलते शानों पर!

    शहर के तपते फ़ुटपाथों पर गाँव के मौसम साथ चलें, बूढ़े बरगद हाथ सा रख दें मेरे जलते शानों पर| जाँ निसार अख़्तर

  • 23rd Mar 2024

    फेंक गई है धानों पर!

    बरखा की तो बात ही छोड़ो चंचल है पुर्वाई भी, जाने किस का सब्ज़ दुपट्टा फेंक गई है धानों पर| जाँ निसार अख़्तर

  • 23rd Mar 2024

    चलते चलते रुक!

    आज भी जैसे शाने पर तुम हाथ मिरे रख देती हो, चलते चलते रुक जाता हूँ सारी की दूकानों पर| जाँ निसार अख़्तर

  • 23rd Mar 2024

    रवींद्र से!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं में अपना अमूल्य योगदान करने वाले तथा धर्मयुग पत्रिका के यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| भारती जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की…

  • 22nd Mar 2024

    घर के रौशनदानों पर!

    आए क्या क्या याद नज़र जब पड़ती इन दालानों पर, उस का काग़ज़ चिपका देना घर के रौशन-दानों पर| जाँ निसार अख़्तर

  • 22nd Mar 2024

    रुस्वा हो सा जाता हूँ!

    तुझे बाँहों में भर लेने की ख़्वाहिश यूँ उभरती है, कि मैं अपनी नज़र में आप रुस्वा हो सा जाता हूँ| जाँ निसार अख़्तर

  • 22nd Mar 2024

    प्यासा हो सा जाता हूँ!

    तिरे गुल-रंग होंटों से दहकती ज़िंदगी पी कर, मैं प्यासा और प्यासा और प्यासा हो सा जाता हूँ| जाँ निसार अख़्तर

  • 22nd Mar 2024

    झूटा हो सा जाता हूँ!

    मैं चाहे सच ही बोलूँ हर तरह से अपने बारे में, मगर तुम मुस्कुराती हो तो झूटा हो सा जाता हूँ| जाँ निसार अख़्तर

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