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मैं भी था तन्हाई भी!
काँच के पीछे चाँद भी था और काँच के ऊपर काई भी, तीनों थे हम वो भी थे और मैं भी था तन्हाई भी| गुलज़ार
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कैसे मिलाता है मुझे!
तेरा मुंकिर* नहीं ऐ वक़्त मगर देखना है, बिछड़े लोगों से कहाँ कैसे मिलाता है मुझे| *न मानने वाला शहरयार
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हौल सा आता है मुझे!
मेरी इन आँखों को ख़्वाबों से पशेमानी है, नींद के नाम से जो हौल सा आता है मुझे| शहरयार
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कौन बुलाता है मुझे!
रात का वक़्त है सूरज है मिरा राह-नुमा, देर से दूर से ये कौन बुलाता है मुझे| शहरयार
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क्या नज़र आता है मुझे
दिल में रखता है न पलकों पे बिठाता है मुझे, फिर भी इक शख़्स में क्या क्या नज़र आता है मुझे| शहरयार
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आषाढ़ का पहला दिवस!
आज फिर से मैं, अपने समय में मंचों के विशिष्ट कवि रहे स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सुमन जी की ये पंक्तियाँ हमारे पूर्व प्रधानमंत्री और स्वयं अच्छे कवि रहे स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी अक्सर दोहराते थे- हार में या जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं, संघर्ष…
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मिरी वहशत का सबब!
मुझ से क्या पूछ रहे हो मिरी वहशत का सबब, बू-ए-आवारा से पूछो कि भटकती क्यूँ है| शहरयार
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बात खटकती क्यूँ है!
तुझ से मिल कर भी न तन्हाई मिटेगी मेरी, दिल में रह रह के यही बात खटकती क्यूँ है| शहरयार
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बेगाना समझती क्यूँ है!
मुझको अपना न कहा इस का गिला तुझ से नहीं, इसका शिकवा है कि बेगाना समझती क्यूँ है| शहरयार
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रंग बदलती क्यूँ है!
जब भी मिलती है मुझे अजनबी लगती क्यूँ है, ज़िंदगी रोज़ नए रंग बदलती क्यूँ है| शहरयार