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दिल में समा के रह गईं
हुस्न-ए-नज़र-फ़रेब में किस को कलाम था मगर, तेरी अदाएँ आज तो दिल में समा के रह गईं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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आँखें चुरा के रह गईं!
मुझ को ख़राब कर गईं नीम-निगाहियाँ* तिरी, मुझ से हयात ओ मौत भी आँखें चुरा के रह गईं| *चितवन फ़िराक़ गोरखपुरी
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नर्म फ़ज़ा की करवटें!
नर्म फ़ज़ा की करवटें दिल को दुखा के रह गईं, ठंडी हवाएँ भी तिरी याद दिला के रह गईं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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चाहना जागी लगे खाँचा बनाने!
आज मैं हिन्दी नवगीत विधा के एक प्रमुख हस्ताक्षर स्वर्गीय नईम जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| नईम जी के कुछ नवगीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं| लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ स्वर्गीय नईम जी का यह नवगीत – चाहना जागी लगे खाँचा बनाने-समय श्रम। दोनों लगे साँचा बनाने। चाहता हूँ…
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कह दूँगी मैं भी साफ़!
वो बे-वफ़ा जो राह में टकरा गया कहीं, कह दूँगी मैं भी साफ़ कि पहचानती नहीं| अंजुम रहबर