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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 13th Sep 2023

    तारीख़ बदल जाएगी!

    रात के बा‘द नए दिन की सहर आएगी, दिन नहीं बदलेगा तारीख़ बदल जाएगी| निदा फ़ाज़ली

  • 13th Sep 2023

    सोचना दीन-दारी लगे!

    उसे देखना शेर-गोई का फ़न, उसे सोचना दीन-दारी लगे| निदा फ़ाज़ली

  • 13th Sep 2023

    पूर्व स्मृति!

    आज एक बार फिर से मैं हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं में अपना अमूल्य योगदान करने वाले स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| अज्ञेय जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की यह…

  • 12th Sep 2023

    हमारी तुम्हारी लगे!

    चलो इस तरह से सजाएँ उसे, ये दुनिया हमारी तुम्हारी लगे| निदा फ़ाज़ली

  • 12th Sep 2023

    सैकड़ों में हज़ारी लगे!

    हसीन सूरतें और भी हैं मगर, वो सब सैकड़ों में हज़ारी लगे| निदा फ़ाज़ली

  • 12th Sep 2023

    देखो वो प्यारी लगे!

    वो ससुराल से आई है माइके, उसे जितना देखो वो प्यारी लगे| निदा फ़ाज़ली

  • 12th Sep 2023

    उजाला सा है उसके!

    उजाला सा है उसके चारों तरफ़, वो नाज़ुक बदन पाँव भारी लगे| निदा फ़ाज़ली

  • 12th Sep 2023

    उम्र सारी हमारी लगे!

    जिसे देखते ही ख़ुमारी लगे, उसे उम्र सारी हमारी लगे| निदा फ़ाज़ली

  • 12th Sep 2023

    आग लगा के रह गईं!

    कौन सुकून दे सका ग़म-ज़दगान-ए-इश्क़ को, भीगती रातें भी ‘फ़िराक़’ आग लगा के रह गईं|  फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 12th Sep 2023

    रंग जमा के रह गईं!

    फिर हैं वही उदासियाँ फिर वही सूनी काएनात, अहल-ए-तरब* की महफ़िलें रंग जमा के रह गईं| *मज़ा करने वालों फ़िराक़ गोरखपुरी

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