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पूर्व स्मृति!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं में अपना अमूल्य योगदान करने वाले स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| अज्ञेय जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की यह…
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आग लगा के रह गईं!
कौन सुकून दे सका ग़म-ज़दगान-ए-इश्क़ को, भीगती रातें भी ‘फ़िराक़’ आग लगा के रह गईं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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रंग जमा के रह गईं!
फिर हैं वही उदासियाँ फिर वही सूनी काएनात, अहल-ए-तरब* की महफ़िलें रंग जमा के रह गईं| *मज़ा करने वालों फ़िराक़ गोरखपुरी