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मैं ने पनाह दी तुझे!
मैं ने पनाह दी तुझे बारिश की रात में, तू जाते जाते आग मिरे घर में डाल दे| कैफ़ भोपाली
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छप्पर में डाल दे!
इस से तिरे मकान का मंज़र है बद-नुमा, चिंगारी मेरे फूस के छप्पर में डाल दे| कैफ़ भोपाली
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तुझे चक्कर में डाल दे!
भाग ऐसे रहनुमा से जो लगता है ख़िज़्र* सा, जाने ये किस जगह तुझे चक्कर में डाल दे| *पैगंबर कैफ़ भोपाली
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मिरी ठोकर में डाल दे!
आ तेरे माल ओ ज़र को मैं तक़्दीस बख़्श दूँ, ला अपना माल ओ ज़र मिरी ठोकर में डाल दे| कैफ़ भोपाली
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घन्त मन्त दुई कौड़ी पावा!
अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की यह कविता – घन्त मन्त दुई कौड़ी पावाकौड़ी लै…
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ये टूटी फूटी नाव!
अल्लाह तेरे साथ है मल्लाह को न देख, ये टूटी फूटी नाव समुंदर में डाल दे| कैफ़ भोपाली
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जिस दिन मिरी जबीं!
जिस दिन मिरी जबीं किसी दहलीज़ पर झुके, उस दिन ख़ुदा शिगाफ़* मिरे सर में डाल दे| *दरार कैफ़ भोपाली
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थोड़ा सा अक्स!
थोड़ा सा अक्स चाँद के पैकर में डाल दे, तू आ के जान रात के मंज़र में डाल दे| कैफ़ भोपाली
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तेरा पता है कि नहीं है!
यूँ ढूँडते फिरते हैं मिरे बाद मुझे वो, वो ‘कैफ़’ कहीं तेरा पता है कि नहीं है| कैफ़ भोपाली