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दीवार गल रही है!
मैं क़त्ल तो हो गया तुम्हारी गली में लेकिन, मिरे लहू से तुम्हारी दीवार गल रही है| जावेद अख़्तर
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जल्दी में!
अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय कुँवर नारायण जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुँवर नारायण जी की यह कविता – प्रियजन मैं बहुत जल्दी में लिख…
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धीरे धीरे पिघल रही है!
जो मुझ को ज़िंदा जला रहे हैं वो बे-ख़बर हैं, कि मेरी ज़ंजीर धीरे धीरे पिघल रही है| जावेद अख़्तर
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रंगत बदल रही है!
वो ढल रहा है तो ये भी रंगत बदल रही है, ज़मीन सूरज की उँगलियों से फिसल रही है| जावेद अख़्तर
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है इक दरवाज़े बिन!
है इक दरवाज़े बिन दीवार-ए-दुनिया, मफ़र* ग़म से यहाँ कोई नहीं है| *बचाव जावेद अख़्तर
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मगर दिल की तो ये!
बहुत से फ़ाएदे हैं मस्लहत* में, मगर दिल की तो ये मर्ज़ी नहीं है| *परामर्श जावेद अख़्तर
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फागुन का गीत!
अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय केदार नाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय केदार नाथ सिंह जी का यह नवगीत – गीतों से भरे दिन…