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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 7th Mar 2024

    दीवार गल रही है!

    मैं क़त्ल तो हो गया तुम्हारी गली में लेकिन, मिरे लहू से तुम्हारी दीवार गल रही है| जावेद अख़्तर

  • 7th Mar 2024

    जल्दी में!

    अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय कुँवर नारायण जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुँवर नारायण जी की यह कविता – प्रियजन मैं बहुत जल्दी में लिख…

  • 6th Mar 2024

    धीरे धीरे पिघल रही है!

    जो मुझ को ज़िंदा जला रहे हैं वो बे-ख़बर हैं, कि मेरी ज़ंजीर धीरे धीरे पिघल रही है| जावेद अख़्तर

  • 6th Mar 2024

    रंगत बदल रही है!

    वो ढल रहा है तो ये भी रंगत बदल रही है, ज़मीन सूरज की उँगलियों से फिसल रही है| जावेद अख़्तर

  • 6th Mar 2024

    है इक दरवाज़े बिन!

    है इक दरवाज़े बिन दीवार-ए-दुनिया, मफ़र* ग़म से यहाँ कोई नहीं है| *बचाव जावेद अख़्तर

  • 6th Mar 2024

    दास्ताँ सुनते हैं जैसे!

    हर इक की दास्ताँ सुनते हैं जैसे, कभी हम ने मोहब्बत की नहीं है| जावेद अख़्तर

  • 6th Mar 2024

    मगर दिल की तो ये!

    बहुत से फ़ाएदे हैं मस्लहत* में, मगर दिल की तो ये मर्ज़ी नहीं है| *परामर्श जावेद अख़्तर

  • 6th Mar 2024

    यही आदत तिरी!

    मुझे मायूस भी करती नहीं है, यही आदत तिरी अच्छी नहीं है| जावेद अख़्तर

  • 6th Mar 2024

    मगर वो बात पहले सी!

    हमारे दिल में अब तल्ख़ी नहीं है, मगर वो बात पहले सी नहीं है| जावेद अख़्तर

  • 6th Mar 2024

    फागुन का गीत!

    अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय केदार नाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय केदार नाथ सिंह जी का यह नवगीत – गीतों से भरे दिन…

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