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घन्त मन्त दुई कौड़ी पावा!
अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की यह कविता – घन्त मन्त दुई कौड़ी पावाकौड़ी लै…
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ये टूटी फूटी नाव!
अल्लाह तेरे साथ है मल्लाह को न देख, ये टूटी फूटी नाव समुंदर में डाल दे| कैफ़ भोपाली
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जिस दिन मिरी जबीं!
जिस दिन मिरी जबीं किसी दहलीज़ पर झुके, उस दिन ख़ुदा शिगाफ़* मिरे सर में डाल दे| *दरार कैफ़ भोपाली
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थोड़ा सा अक्स!
थोड़ा सा अक्स चाँद के पैकर में डाल दे, तू आ के जान रात के मंज़र में डाल दे| कैफ़ भोपाली
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तेरा पता है कि नहीं है!
यूँ ढूँडते फिरते हैं मिरे बाद मुझे वो, वो ‘कैफ़’ कहीं तेरा पता है कि नहीं है| कैफ़ भोपाली
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दे दे इस साहसी अकेले को!
अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय विजयदेव नारायण साही जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी एक ही रचना मैंने पहले शेयर की है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय विजयदेव नारायण साही जी की यह कविता – दे दे रेदे दे…
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ख़ता है कि नहीं है!
सच है कि मोहब्बत में हमें मौत ने मारा, कुछ इस में तुम्हारी भी ख़ता है कि नहीं है| कैफ़ भोपाली
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दवा है कि नहीं है!
बीमार-ए-मोहब्बत की दवा है कि नहीं है, मेरे किसी पहलू में क़ज़ा* है कि नहीं है| *इंसाफ कैफ़ भोपाली