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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 12th Mar 2024

    ये तारे रौशनी अपनी!

    नहीं घटती मिरी आँखों में तारीकी शब-ए-ग़म की, ये तारे रौशनी अपनी अबस बरबाद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण

  • 12th Mar 2024

    हम आबाद करते हैं!

    मोहब्बत के चमन में मजमा-ए-अहबाब रहता है, नई जन्नत इसी दुनिया में हम आबाद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण

  • 12th Mar 2024

    रूह को आज़ाद!

    निकल कर अपने क़ालिब* से नया क़ालिब बसाएगी, असीरी के लिए हम रूह को आज़ाद करते हैं| *Body चकबस्त ब्रिज नारायण

  • 12th Mar 2024

    क़ैद से आज़ाद करते हैं

    नया मस्लक नया रंग-ए-सुख़न ईजाद करते हैं, उरूस-ए-शेर को हम क़ैद से आज़ाद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण

  • 12th Mar 2024

    फ़रिश्ते दंग हैं वो!

    हवा में उड़ के सैर-ए-आलम-ए-ईजाद करते हैं, फ़रिश्ते दंग हैं वो काम आदम-ज़ाद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण

  • 12th Mar 2024

    नए झगड़े निराली!

    नए झगड़े निराली काविशें ईजाद करते हैं, वतन की आबरू अहल-ए-वतन बरबाद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण

  • 12th Mar 2024

    बुद्धूराम!

    अज्ञेय जी द्वारा संपादित सप्तकों के कवियों की कविताएं और उसमें से चौथा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज मैं श्री राजकुमार  कुंभज जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी शायद एक ही रचना मैंने पहले शेयर की है| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री राजकुमार कुंभज जी की…

  • 11th Mar 2024

    जो थी आशियाँ के लिए

    पलट के सू-ए-चमन देखने से क्या होगा, वो शाख़ ही न रही जो थी आशियाँ के लिए| साहिर लुधियानवी

  • 11th Mar 2024

    सिर्फ़ दास्ताँ के लिए!

    न तू ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए, तिरा वजूद है अब सिर्फ़ दास्ताँ के लिए| साहिर लुधियानवी

  • 11th Mar 2024

    तिरे ख़यालों से दूर!

    न सोचने पर भी सोचती हूँ कि ज़िंदगानी में क्या रहेगा, तिरी तमन्ना को दफ़्न कर के तिरे ख़यालों से दूर जा के| साहिर लुधियानवी

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