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ये तारे रौशनी अपनी!
नहीं घटती मिरी आँखों में तारीकी शब-ए-ग़म की, ये तारे रौशनी अपनी अबस बरबाद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण
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हम आबाद करते हैं!
मोहब्बत के चमन में मजमा-ए-अहबाब रहता है, नई जन्नत इसी दुनिया में हम आबाद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण
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रूह को आज़ाद!
निकल कर अपने क़ालिब* से नया क़ालिब बसाएगी, असीरी के लिए हम रूह को आज़ाद करते हैं| *Body चकबस्त ब्रिज नारायण
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क़ैद से आज़ाद करते हैं
नया मस्लक नया रंग-ए-सुख़न ईजाद करते हैं, उरूस-ए-शेर को हम क़ैद से आज़ाद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण
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नए झगड़े निराली!
नए झगड़े निराली काविशें ईजाद करते हैं, वतन की आबरू अहल-ए-वतन बरबाद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण
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बुद्धूराम!
अज्ञेय जी द्वारा संपादित सप्तकों के कवियों की कविताएं और उसमें से चौथा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज मैं श्री राजकुमार कुंभज जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी शायद एक ही रचना मैंने पहले शेयर की है| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री राजकुमार कुंभज जी की…
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जो थी आशियाँ के लिए
पलट के सू-ए-चमन देखने से क्या होगा, वो शाख़ ही न रही जो थी आशियाँ के लिए| साहिर लुधियानवी
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सिर्फ़ दास्ताँ के लिए!
न तू ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए, तिरा वजूद है अब सिर्फ़ दास्ताँ के लिए| साहिर लुधियानवी
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तिरे ख़यालों से दूर!
न सोचने पर भी सोचती हूँ कि ज़िंदगानी में क्या रहेगा, तिरी तमन्ना को दफ़्न कर के तिरे ख़यालों से दूर जा के| साहिर लुधियानवी