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ख़ुशियों के बटवारे तक
ख़ुशियों के बटवारे तक ही ऊँचे नीचे आगे पीछे, दुनिया के मिट जाने का डर जितना तेरा उतना मेरा| निदा फ़ाज़ली
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साँसें जितनी मौजें!
साँसें जितनी मौजें उतनी सब की अपनी अपनी गिनती, सदियों का इतिहास समुंदर जितना तेरा उतना मेरा| निदा फ़ाज़ली
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आँसू सपना चाहत!
हर जीवन की वही विरासत आँसू सपना चाहत मेहनत, साँसों का हर बोझ बराबर जितना तेरा उतना मेरा| निदा फ़ाज़ली
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गेहूँ चावल बाँटने वाले!
गेहूँ चावल बाँटने वाले झूटा तौलें तो क्या बोलें, यूँ तो सब कुछ अंदर बाहर जितना तेरा उतना मेरा| निदा फ़ाज़ली
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जितना तेरा उतना मेरा!
एक ही धरती हम सब का घर जितना तेरा उतना मेरा, दुख सुख का ये जंतर-मंतर जितना तेरा उतना मेरा| निदा फ़ाज़ली
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भटका मेघ!
आज मैं विख्यात हिन्दी कवि स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कविताएं शायद मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा जी की यह कविता – भटक गया हूँ—मैं असाढ़ का पहला बादलश्वेत फूल-सी अलका कीमैं पंखुरियों तक छू न सका हूँकिसी शाप से…
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किसी शुमार में!
मुझ से ही है हर एक सियासत का ए‘तिबार, फिर भी किसी शुमार में हूँ भी नहीं भी हूँ| निदा फ़ाज़ली
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इक मैं ही इस दयार में!
औरों के साथ ऐसा कोई मसअला नहीं, इक मैं ही इस दयार में हूँ भी नहीं भी हूँ| निदा फ़ाज़ली
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मैं अपने ही मज़ार में!
फ़िहरिस्त मरने वालों की क़ातिल के पास है, मैं अपने ही मज़ार में हूँ भी नहीं भी हूँ| निदा फ़ाज़ली
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मैं तेरे इंतिज़ार में!
तेरी ही जुस्तुजू में लगा है कभी कभी, मैं तेरे इंतिज़ार में हूँ भी नहीं भी हूँ| निदा फ़ाज़ली