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बहुत बे-ज़बान है!
वो आदमी मिला था मुझे उस की बात से, ऐसा लगा कि वो भी बहुत बे-ज़बान है| दुष्यंत कुमार
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बाबुल तुम बगिया के तरुवर!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी काव्य मंचों पर अपने समय में एक अलग पहचान बनाने वाले कवि स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| नेपाली जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की यह कविता –…
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हम को पता नहीं था!
फिस्ले जो उस जगह तो लुढ़कते चले गए, हम को पता नहीं था कि इतनी ढलान है| दुष्यंत कुमार
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धान जब भी फूटता है!
आज एक बार फिर मैं वरिष्ठ एवं श्रेष्ठ हिन्दी नवगीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – धान जब भी फूटता है गाँव मेंएक बच्चा दुधमुँहा किलकारियाँ…
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झोले में उस के पास!
सामान कुछ नहीं है फटे-हाल है मगर, झोले में उस के पास कोई संविधान है| दुष्यंत कुमार
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इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तुगू
वो कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तुगू, मैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान है| दुष्यंत कुमार
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दर्द के गीत गा सके!
अहल-ए-ज़बाँ तो हैं बहुत कोई नहीं है अहल-ए-दिल, कौन तिरी तरह ‘हफ़ीज़’ दर्द के गीत गा सके| हफ़ीज़ जालंधरी