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स्वतंत्रता दिवस की पुकार!
आज एक बार फिर मैं हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री रहे हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और कुशल राजनेता स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| अटल जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की यह कविता – पन्द्रह अगस्त…
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दिल की बेआरामी भी!
यूँ तो सुकूँ के लम्हे ‘क़ैसर’ होते हैं अनमोल बहुत, लेकिन अपने काम आती है दिल की बे-आरामी भी| क़ैसर शमीम
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मेरे हल्क़े में आते हैं!
मेरा मज़हब इश्क़ का मज़हब जिस में कोई तफ़रीक़ नहीं, मेरे हल्क़े में आते हैं ‘तुलसी’ भी और ‘जामी’ भी| क़ैसर शमीम
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उसमें होगी ख़ामी भी!
ऐसा तो मुमकिन ही नहीं है चाँद में कोई दाग़ न हो, जिस में होगी कुछ भी ख़ूबी उस में होगी ख़ामी भी| क़ैसर शमीम
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और हैं कितने हामी भी
महफ़िल महफ़िल ज़िक्र हमारा सोच समझ के कर वाइज़, अपने मुख़ालिफ़ भी हैं कितने और हैं कितने हामी भी| क़ैसर शमीम
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काम की है नाकामी भी
कितने आशिक़ सँभल गए हैं मेरा फ़साना सुन सुन कर, मेरे हक़ में जैसी भी हो काम की है नाकामी भी| क़ैसर शमीम
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थोड़ी सी बदनामी भी!
थोड़ी सी शोहरत भी मिली है थोड़ी सी बदनामी भी, मेरी सीरत में ऐ ‘क़ैसर’ ख़ूबी भी है ख़ामी भी| क़ैसर शमीम