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तलवार छीन लाए हैं!
मिरे क़बीले के बच्चों के खेल भी हैं अजीब, किसी सिपाही की तलवार छीन लाए हैं| राहत इंदौरी
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वतन की ज़मीन लाए हैं!
हँसो न हम पे कि हर बद-नसीब बंजारे, सरों पे रख के वतन की ज़मीन लाए हैं| राहत इंदौरी
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जो पर्बतों के लिए!
हमारी बात की गहराई ख़ाक समझेंगे, जो पर्बतों के लिए ख़ुर्दबीन लाए हैं| राहत इंदौरी
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मानवता का दर्द लिखेंगे!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के प्रसिद्ध जनकवि स्वर्गीय अदम गोंडवी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय अदम गोंडवी जी की यह कविता – मानवता का दर्द लिखेंगे, माटी की बू-बास लिखेंगे ।हम अपने इस कालखण्ड का एक…
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फटी आस्तीन लाए हैं!
वो और होंगे जो ख़ंजर छुपा के लाते हैं, हम अपने साथ फटी आस्तीन लाए हैं| राहत इंदौरी
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ग़ज़ल की ज़मीन लाए हैं!
चमकते लफ़्ज़ सितारों से छीन लाए हैं, हम आसमाँ से ग़ज़ल की ज़मीन लाए हैं| राहत इंदौरी
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भीगने के बा’द भारी हो गए!
नर्म-ओ-नाज़ुक हल्के-फुल्के रूई जैसे ख़्वाब थे, आँसुओं में भीगने के बा‘द भारी हो गए| राहत इंदौरी
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अहकामात जारी हो गए!
रख दिए जाएँगे नेज़े लफ़्ज़ और होंटों के बीच, ज़िल्ल-ए-सुब्हानी के अहकामात जारी हो गए| राहत इंदौरी
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चाँद पागल हो गया!
रौशनी की जंग में तारीकियाँ पैदा हुईं, चाँद पागल हो गया तारे भिकारी हो गए| राहत इंदौरी