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कोई अजनबी तो नहीं
तुम्हारी बज़्म में अफ़्साना कहते डरता हूँ, ये सोचता हूँ यहाँ कोई अजनबी तो नहीं| कृष्ण बिहारी नूर
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ये ज़िंदगी तो नहीं!
ये हिज्र-ए-यार ये पाबंदियाँ इबादत की, किसी ख़ता की सज़ा है ये ज़िंदगी तो नहीं| कृष्ण बिहारी नूर
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कहाँ ग़म-ए-जानाँ!
ग़म-ए-हबीब कहाँ और कहाँ ग़म-ए-जानाँ, मुसाहिबत है यक़ीनन बराबरी तो नहीं| कृष्ण बिहारी नूर
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ये आशियानों के जलने
हुई जो जश्न-ए-बहाराँ के नाम से मंसूब, ये आशियानों के जलने की रौशनी तो नहीं| कृष्ण बिहारी नूर
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हमारी पहली मुलाक़ात
मिटे ये शुबह तो ए दोस्त तुझ से बात करें, हमारी पहली मुलाक़ात आख़िरी तो नहीं| कृष्ण बिहारी नूर
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माँगी हुई हँसी तो नहीं
हज़ार ग़म सही दिल में मगर ख़ुशी ये है, हमारे होंटों पे माँगी हुई हँसी तो नहीं| कृष्ण बिहारी नूर
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जबीं को दर पे झुकाना
जबीं को दर पे झुकाना ही बंदगी तो नहीं, ये देख मेरी मोहब्बत में कुछ कमी तो नहीं| कृष्ण बिहारी नूर
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बिम्ब दुहरे-तिहरे!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी नवगीत के अमर कवि स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| रंजक जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत – दर्द तुमने गाया क्या गीत, अधभरे घाव हरे हो…