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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 15th Dec 2024

    गुल खिले जाते हैं वो!

    गर्मी-ऐ-शौक़-ऐ-नज़ारा का असर तो देखो,गुल खिले जाते हैं वो साया-ए-तर तो देखो| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 15th Dec 2024

    कुछ अपने दिल की!

    कुछ अपने दिल की ख़ू का भी शुक्राना चाहिए,सौ बार उन की ख़ू का गिला कर चुके हैं हम| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 15th Dec 2024

    फीका है अब भी रंग!

    उन की नज़र में क्या करें फीका है अब भी रंग,जितना लहू था सर्फ़-ए-क़बा कर चुके हैं हम| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 15th Dec 2024

    खांटी घरेलू औरत!

    आज मैं एक श्रेष्ठ हिंदी उपन्यास लेखिका सुश्री ममता कालिया जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। ममता जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है सुश्री ममता कालिया जी की यह कविता – 1.कभी कोई ऊंची बात नहीं सोचतीखांटी घरेलू औरतउसका दिन कतर-ब्योंत में बीत जाता हैऔर रात…

  • 14th Dec 2024

    अब अपना इख़्तियार!

    अब अपना इख़्तियार है चाहे जहाँ चलें, रहबर से अपनी राह जुदा कर चुके हैं हम| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 14th Dec 2024

    देखें है कौन कौन!

    देखें है कौन कौन ज़रूरत नहीं रही, कू-ए-सितम में सब को ख़फ़ा कर चुके हैं हम| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 14th Dec 2024

    अब एहतियात की !

    अब एहतियात की कोई सूरत नहीं रही,क़ातिल से रस्म-ओ-राह सिवा कर चुके हैं हम| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 14th Dec 2024

    सब कुछ निसार!

    क़र्ज़-ए-निगाह-ए-यार अदा कर चुके हैं हम,सब कुछ निसार-ए-राह-ए-वफ़ा कर चुके हैं हम| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 14th Dec 2024

    किसी की ख़ास अदा!

    ये काएनात तो लगता है ‘नूर’ जैसे हो,किसी की ख़ास अदा से लिखा हुआ इक नाम| कृष्ण बिहारी नूर

  • 14th Dec 2024

    हथेलियों पे हिना से!

    कभी खुलेंगी अगर मुट्ठियाँ तो देखेंगे,हथेलियों पे हिना से लिखा हुआ इक नाम| कृष्ण बिहारी नूर

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