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अब तो चेहरे को ही
कौन पढ़ता है यहाँ खोल के अब दिल की किताब, अब तो चेहरे को ही अख़बार किया जाना है| राजेश रेड्डी
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ये तमाशा तो कई बार
एक ही बार में उक्ता से गए हो जिस से, ये तमाशा तो कई बार किया जाना है| राजेश रेड्डी
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ख़ुद को रुस्वा!
ख़्वाबों और ख़्वाहिशों की बातों में आ कर कब तक, ख़ुद को रुस्वा सर-ए-बाज़ार किया जाना है| राजेश रेड्डी
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मसअला ये है कि!
मसअला ये नहीं कि इश्क़ हुआ है हम को, मसअला ये है कि इज़हार किया जाना है| राजेश रेड्डी
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इक मुख़ालिफ़ को!
देखनी है कभी आईने में अपनी सूरत, इक मुख़ालिफ़ को तरफ़-दार किया जाना है| राजेश रेड्डी
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बुत बस अपना ही!
तोड़ के रख दिए बाक़ी तो अना ने सारे, बुत बस इक अपना ही मिस्मार किया जाना है| राजेश रेड्डी
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धानों का गीत!
आज एक बार मैं हिन्दी श्रेष्ठ कवि और नवगीतकार स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज प्रस्तुत है स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जी का यह नवगीत- धान उगेंगे कि प्रान उगेंगे उगेंगे हमारे खेत में, आना जी, बादल ज़रूर !चन्दा को बाँधेंगे कच्ची कलगियों सूरज…
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इक ज़रा ज़ेहन को!
दिल तो दुनिया से निकलने पे है आमादा मगर, इक ज़रा ज़ेहन को तय्यार किया जाना है| राजेश रेड्डी
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बीमार किया जाना है!
हम तसव्वुर में बना बैठे हैं इक चारा-गर, ख़ुद को जिस के लिए बीमार किया जाना है| राजेश रेड्डी
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दीदार किया जाना है!
शौक़ की हद को अभी पार किया जाना है, आइने में तिरा दीदार किया जाना है| राजेश रेड्डी