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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 17th Jun 2024

    तुम मुस्कुराती हो तो!

    मैं चाहे सच ही बोलूँ हर तरह से अपने बारे में, मगर तुम मुस्कुराती हो तो झूटा हो सा जाता हूँ| जाँ निसार अख़्तर

  • 17th Jun 2024

    तन्हा हो सा जाता हूँ!

    मैं तुम से दूर रहता हूँ तो मेरे साथ रहती हो, तुम्हारे पास आता हूँ तो तन्हा हो सा जाता हूँ| जाँ निसार अख़्तर

  • 17th Jun 2024

    स्रोत- गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

    आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…

  • 16th Jun 2024

    मगर वो लम्हा जब मैं!

    मुझे मालूम है मैं सारी दुनिया की अमानत हूँ, मगर वो लम्हा जब मैं सिर्फ़ अपना हो सा जाता हूँ| जाँ निसार अख़्तर

  • 16th Jun 2024

    झुकी झुकी कुलाहें!

    मिरे अहद में नहीं है ये निशान-ए-सरबुलंदी, ये रंगे हुए अमामे* ये झुकी झुकी कुलाहें|     *पगड़ी मजरूह सुल्तानपुरी

  • 16th Jun 2024

    तिरी आरज़ू ने हँसकर!

    कभी जादा-ए-तलब से जो फिरा हूँ दिल-शिकस्ता, तिरी आरज़ू ने हँस कर वहीं डाल दी हैं बाँहें| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 16th Jun 2024

    वहीं इनकी बारगाहें!

    तिरे ख़ानुमाँ-ख़राबों का चमन कोई न सहरा, ये जहाँ भी बैठ जाएँ वहीं इन की बारगाहें| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 16th Jun 2024

    कहीं ज़ुल्मतों में!

    कहीं ज़ुल्मतों में घिर कर है तलाश-ए-दश्त-ए-रहबर, कहीं जगमगा उठी हैं मिरे नक़्श-ए-पा से राहें| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 16th Jun 2024

    अहंकार और विनयशीलता!

    कल मैंने ज्ञानमार्ग और प्रेम मार्ग के बहाने कुछ लिखा था| आज मुझे राजनैतिक परिदृश्य से उसका एक उदाहरण याद आ रहा है, यद्यपि राजनीति के मामले में सबकी राय अलग रहती है और कुछ लोगों की बहुत कठोर धारणाएं होती हैं कुछ नेताओं के बारे में, लेकिन फिर भी जो बात मेरे मन में…

  • 15th Jun 2024

    ग़म-ए-ज़िंदगी निबाहें!

    ये रुके रुके से आँसू ये दबी दबी सी आहें, यूँही कब तलक ख़ुदाया ग़म-ए-ज़िंदगी निबाहें| मजरूह सुल्तानपुरी

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