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अब तक हैं इस गुमाँ में
अब तक हैं इस गुमाँ में कि हम भी हैं दहर* में, इस वहम से नजात की सूरत नहीं मिली| *दुनिया मुनीर नियाज़ी
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इन बस्तियों में हमको
थी जिस की जुस्तुजू वो हक़ीक़त नहीं मिली, इन बस्तियों में हम को रिफ़ाक़त नहीं मिली| मुनीर नियाज़ी
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चम्बल एक नदी का नाम!
आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठकवि श्री नरेश मेहता जी की एक कविता का पहला अंश शेयर कर रहा हूँ| मेहता जी की अधिक रचनाएं मैंने शायद पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री नरेश मेहता जी की यह कविता- यह महाराजा रन्तिदेव के अग्निहोत्र मेंकाटी गई सहस्त्रों गायों और बछड़ों केबहे ख़ून…
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सुब्ह को रो रो शाम करो!
‘मीर‘ से बैअ‘त की है तो ‘इंशा‘ मीर की बैअ‘त भी है ज़रूर, शाम को रो रो सुब्ह करो अब सुब्ह को रो रो शाम करो| इब्न-ए-इंशा
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सवाब का काम करो!
दिल की मताअ‘ तो लूट रहे हो हुस्न की दी है ज़कात कभी, रोज़-ए-हिसाब क़रीब है लोगो कुछ तो सवाब का काम करो| इब्न-ए-इंशा
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दिलों को ग़ुलाम करो!
कब से खड़े हैं बर में ख़िराज-ए-इश्क़ के लिए सर-ए-राहगुज़ार, एक नज़र से सादा-रुख़ो हम सादा-दिलों को ग़ुलाम करो| इब्न-ए-इंशा
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रात क़याम करो!
जंगल जंगल शौक़ से घूमो दश्त की सैर मुदाम करो, ‘इंशा‘-जी हम पास भी लेकिन रात की रात क़याम करो| इब्न-ए-इंशा
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अख़बार के बीच!
मिन्नत-ए-क़ासिद कौन उठाए शिकवा-ए-दरबाँ कौन करे, नामा-ए-शौक़ ग़ज़ल की सूरत छपने को दो अख़बार के बीच| इब्न-ए-इंशा
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तुझी को ख़बर न मिले
ख़ार-ओ-ख़स-ओ-ख़ाशाक तो जानें एक तुझी को ख़बर न मिले, ऐ गुल-ए-ख़ूबी हम तो अबस बदनाम हुए गुलज़ार के बीच| इब्न-ए-इंशा
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भरी बहार के बीच
पीना-पिलाना ऐन गुनह है जी का लगाना ऐन हवस, आप की बातें सब सच्ची हैं लेकिन भरी बहार के बीच| इब्न-ए-इंशा