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दस देहों की गंध!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठकवि श्री अनूप अशेष जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| अनूप जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अनूप अशेष जी की यह कविता- दो कमरे का घरदस देहों की गंधऔर तुमहर कोने में। हर बासी सुबहोंबासी ख़बरों…
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फेरे कभी-कभी के!
भूली-बिसरी यादों के ओ जोगी आते रहियो,जी हल्का कर जाते तेरे फेरे कभी-कभी के| सूर्यभानु गुप्त
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मन्दिर, मसजिद, नेता!
हैज़ा, टी. बी.,चेचक से मरती थी पहले दुनिया,मन्दिर, मसजिद, नेता, कुरसी हैं ये रोग अभी के| सूर्यभानु गुप्त
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बँधुआ मज़दूरों से अब!
सारी उम्र छुड़ाते गुज़रे महाजनों से – चेहरे,बँधुआ मज़दूरों से अब तो जीवन हुये सभी के| सूर्यभानु गुप्त
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पत्थर किसी नदी के!
किस को मन के घाव दिखायें हाल सुनायें जी के,इन्सानों से ज़ियादा अच्छे पत्थर किसी नदी के| सूर्यभानु गुप्त
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शहर पर ये ज़ुल्म!
शहर को बरबाद कर के रख दिया उस ने ‘मुनीर‘, शहर पर ये ज़ुल्म मेरे नाम पर उस ने किया| मुनीर नियाज़ी
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मुझे इस शहर में!
शहर में वो मो‘तबर मेरी गवाही से हुआ, फिर मुझे इस शहर में ना–मो‘तबर उस ने किया| मुनीर नियाज़ी
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मुझको सीधे रास्ते से
राहबर मेरा बना गुमराह करने के लिए, मुझ को सीधे रास्ते से दर–ब–दर उस ने किया| मुनीर नियाज़ी
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पीलिया सैलाब!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत- सीप -शंखों तक हमें भी ले चलेंगेपीलिया सैलाब में बहते हुए दिन टूटती…
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पर मुझे इस मुल्क में
मैं बहुत कमज़ोर था इस मुल्क में हिजरत के बा‘द, पर मुझे इस मुल्क में कमज़ोर–तर उस ने किया| मुनीर नियाज़ी