-
कोई साया मिरे बाज़ू से
रास्ते भर कोई आहट थी कि आती ही रही, कोई साया मिरे बाज़ू से गुज़रता ही रहा| जाँ निसार अख़्तर
-
चाँद उतरता ही रहा!
रौशनी कम न हुई वक़्त के तूफ़ानों में, दिल के दरिया में कोई चाँद उतरता ही रहा| जाँ निसार अख़्तर
-
चाँद उतरता ही रहा!
रौशनी कम न हुई वक़्त के तूफ़ानों में, दिल के दरिया में कोई चाँद उतरता ही रहा| जाँ निसार अख़्तर
-
कोई सँवरता ही रहा!
दीदा ओ दिल में कोई हुस्न बिखरता ही रहा, लाख पर्दों में छुपा कोई सँवरता ही रहा| जाँ निसार अख़्तर
-
यहाँ से भी चलें!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठनवगीतकर स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| ओम प्रभाकर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का यह नवगीत- चलें, अब तो यहाँ से भी चलें। उठ गएहिलते हुए रंगीन कपड़ेसूखते।(अपाहिज हैं…
-
चाँद की एक दरांती थी
तारों की रौशन फ़सलें और चाँद की एक दरांती थी, साहू ने गिरवी रख ली थी मेरी रात कटाई की| गुलज़ार
-
रेत कभी तन्हाई की!
आँखों और कानों में कुछ सन्नाटे से भर जाते हैं, क्या तुम ने उड़ती देखी है रेत कभी तन्हाई की| गुलज़ार
-
आदत है हरजाई की!
सीने में दिल की आहट जैसे कोई जासूस चले, हर साए का पीछा करना आदत है हरजाई की| गुलज़ार
-
आवाज़ किसी सौदाई!
नींद में कोई अपने-आप से बातें करता रहता है, काल-कुएँ में गूँजती है आवाज़ किसी सौदाई की| गुलज़ार
-
चाँदनी रात जुदाई की!
तिनका तिनका काँटे तोड़े सारी रात कटाई की, क्यूँ इतनी लम्बी होती है चाँदनी रात जुदाई की| गुलज़ार