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ऐ मेरी आरज़ू !
ऐसा न हो गुनाह की दलदल में जा फँसूँ, ऐ मेरी आरज़ू मुझे ले चल सँभाल के| कृष्ण बिहारी नूर
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लफ़्ज़ों के ये नगीने तो!
लफ़्ज़ों के ये नगीने तो निकले कमाल के, ग़ज़लों ने ख़ुद पहन लिए ज़ेवर ख़याल के| कृष्ण बिहारी नूर
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वह चिड़िया जो!
आज मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय केदारनाथ अग्रवाल जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय केदारनाथ अग्रवाल जी की यह कविता – वह चिड़िया जो-चोंच मार करदूध-भरे जुंडी के दानेरुचि से, रस से खा लेती हैवह छोटी संतोषी…
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आते आते यूँ ही!
आते आते यूँही दम भर को रुकी होगी बहार, जाते जाते यूँही पल भर को ख़िज़ाँ ठहरी है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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बुलबुल की ज़बाँ!
दस्त-ए-सय्याद भी आजिज़ है कफ़-ए-गुल-चीं भी, बू-ए-गुल ठहरी न बुलबुल की ज़बाँ ठहरी है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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दिल से निकली है तो!
बिखरी इक बार तो हाथ आई है कब मौज-ए-शमीम, दिल से निकली है तो कब लब पे फ़ुग़ाँ ठहरी है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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निगह-ए-शौक़ घड़ी भर!
है वही आरिज़-ए-लैला वही शीरीं का दहन, निगह-ए-शौक़ घड़ी भर को जहाँ ठहरी है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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राहत-ए-जाँ ठहरी है!
आज तक शैख़ के इकराम में जो शय थी हराम, अब वही दुश्मन-ए-दीं राहत-ए-जाँ ठहरी है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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जो भी चल निकली है!
अब वही हर्फ़-ए-जुनूँ सब की ज़बाँ ठहरी है, जो भी चल निकली है वो बात कहाँ ठहरी है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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कौन क़ातिल बचा है!
कौन क़ातिल बचा है शहर में ‘फ़ैज़’, जिस से यारों ने रस्म-ओ-राह न की| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़