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फूल इस क़िस्म का!
जिसकी ख़ुशबू से महक जाय पड़ोसी का भी घरफूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए। गोपाल दास नीरज
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याद न जाए बीते दिनों की!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में रफी साहब का गाया ‘दिल एक मंदिर’ फिल्म का यह गीत अपने स्वर में प्रस्तुत कर रहा हूँ- याद न जाए बीते दिनों की! आशा है आपको यह पसंद आएगा,धन्यवाद। ******
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काफ़ी दिन हो गये!
आज मैं हिंदी के अनूठे कवि स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। भवानी दादा की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है भवानी दादा की यह कविता– काफ़ी दिन हो गयेलगभग छै साल कहोतब से एक कोशिश कर रहा हूँ मगर होता कुछ…
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देखना ये है कि!
चाँद को छूके चले आए हैं विज्ञान के पंख,देखना ये है कि इन्सान कहाँ तक पहुँचे । गोपाल दास नीरज
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आवाज़ वहाँ तक पहुँचे!
एक इस आस पे अब तक है मेरी बन्द जुबाँ,कल को शायद मेरी आवाज़ वहाँ तक पहुँचे । गोपाल दास नीरज
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तेरे मकाँ तक पहुँचे !
वो न ज्ञानी ,न वो ध्यानी, न बिरहमन, न वो शेख,वो कोई और थे जो तेरे मकाँ तक पहुँचे । गोपाल दास नीरज
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ख़ामोश है सारी महफ़िल!
इतना मालूम है, ख़ामोश है सारी महफ़िल,पर न मालूम, ये ख़ामोशी कहाँ तक पहुँचे । गोपाल दास नीरज
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अशआर मेरे यूं तो!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं जां निसार अख्तर साहब की एक ग़ज़ल अपने स्वर में प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे अनूप जलोटा जी ने भी गाया है- अशआर मेरे यूं तो ज़माने के लिए हैं! आशा है आपको यह पसंद आएगी, धन्यवाद। *******