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यह समय झरता हुआ!
आज मैं श्रेष्ठ हिन्दी नवगीतकार स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| ओम प्रभाकर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का यह नवगीत – उफ़, यह समयझरता हुआ। कल के बेडौल हाथोंहुए ख़ुद से त्रस्त। कहीं कोई हैकि हममें…
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मैं ज़र्द पत्तों पे शबनम!
मैं ज़र्द पत्तों पे शबनम सजा के लाया हूँ,किसी ने मुझ से कहा था हिसाब दे जाओ| बशीर बद्र
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फ़क़ीर कब से खड़ा!
बहुत से और भी घर हैं ख़ुदा की बस्ती में,फ़क़ीर कब से खड़ा है जवाब दे जाओ| बशीर बद्र
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शोहरत की बुलंदी भी!
शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है,जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है| बशीर बद्र
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ख़ुश-रंग परिंदों के!
ख़ुश-रंग परिंदों के लौट आने के दिन आए,बिछड़े हुए मिलते हैं जब बर्फ़ पिघलती है| बशीर बद्र