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मेरी कुछ और रचनाएं-4
एक बार फिर से कुछ पुरानी रचनाएं मिल गईं सोचा इनको भी ढोल पीट लेता हूँ, क्योंकि बहुत समय पहले 1980 में दिल्ली छोड़ दी थी और रचनाकर्म भी लगभग छूट ही गया था| अधिकतर सुदूर प्रोजेक्ट्स में रहा और अब 7 से अधिक वर्षों से गोवा में रह रहा हूँ, जहां साहित्यिक सपोर्ट और…
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कहने की सज़ा लो!
लोग कहते थे कि ये बात नहीं कहने की,तुम ने कह दी है तो कहने की सज़ा लो यारो| दुष्यंत कुमार
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बहकती हुई दुनिया!
रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया,इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारो| दुष्यंत कुमार
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आज संदूक़ से वो!
आज सीवन को उधेड़ो तो ज़रा देखेंगे,आज संदूक़ से वो ख़त तो निकालो यारो| दुष्यंत कुमार
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आज सय्याद को !
लोग हाथों में लिए बैठे हैं अपने पिंजरे,आज सय्याद को महफ़िल में बुला लो यारो| दुष्यंत कुमार
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मेरी कुछ और रचनाएं-3
एक बार फिर से कुछ पुरानी रचनाएं मिल गईं सोचा इनको भी ढोल पीट लेता हूँ, क्योंकि बहुत समय पहले 1980 में दिल्ली छोड़ दी थी और रचनाकर्म भी लगभग छूट ही गया था| अधिकतर सुदूर प्रोजेक्ट्स में रहा और अब 7 से अधिक वर्षों से गोवा में रह रहा हूँ, जहां साहित्यिक सपोर्ट और…
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मैं रहूँ या न रहूँ!
मैं रहूँ या न रहूँ नाम रहेगा मेरा,ज़िंदगी उम्र में कुछ मुझ से बड़ी लगती है| मुनव्वर राना