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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 1st Oct 2024

    नदी का धारा दिन!

    दुनिया की हर चीज़ बही,चढ़ी नदी का धारा दिन| सूर्यभानु गुप्त

  • 1st Oct 2024

    पाला हुआ कबूतर है!

    पाला हुआ कबूतर है,उड़, लौटे दोबारा दिन| सूर्यभानु गुप्त

  • 1st Oct 2024

    मेरी कुछ और रचनाएं-5

    एक बार फिर से कुछ पुरानी रचनाएं मिल गईं सोचा इनको भी ढोल पीट लेता हूँ, क्योंकि बहुत समय पहले 1980 में दिल्ली छोड़ दी थी और रचनाकर्म भी लगभग छूट ही गया था| अधिकतर सुदूर प्रोजेक्ट्स में रहा और अब 7 से अधिक वर्षों से गोवा में रह रहा हूँ, जहां साहित्यिक सपोर्ट और…

  • 30th Sep 2024

    लगे यूँ प्यारा दिन!

    सुबह लगे यूँ प्यारा दिन,जैसे नाम तुम्हारा दिन| सूर्यभानु गुप्त

  • 30th Sep 2024

    चल पड़ी तो इधर!

    हम खड़े थे कि ये ज़मीं होगी,चल पड़ी तो इधर उधर देखा| दुष्यंत कुमार

  • 30th Sep 2024

    परिंदे को चोट आई!

    उस परिंदे को चोट आई तो,आप ने एक एक पर देखा| दुष्यंत कुमार

  • 30th Sep 2024

    गालियों में बड़ा असर!

    नालियों में हयात देखी है,गालियों में बड़ा असर देखा| दुष्यंत कुमा

  • 30th Sep 2024

    रास्ता अगर देखा!

    रास्ता काट कर गई बिल्ली,प्यार से रास्ता अगर देखा| दुष्यंत कुमार

  • 30th Sep 2024

    ठहरा हुआ सफ़र!

    पाँव टूटे हुए नज़र आए,एक ठहरा हुआ सफ़र देखा| दुष्यंत कुमार

  • 30th Sep 2024

    वीरान अपना घर!

    आज वीरान अपना घर देखा,तो कई बार झाँक कर देखा| दुष्यंत कुमार

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