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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 3rd Oct 2024

    अगरचे रह में हुईं!

    पहुँच के दर पे तिरे कितने मो’तबर ठहरे,अगरचे रह में हुईं जग-हँसाइयाँ क्या क्या| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 3rd Oct 2024

    बहम हुए तो पड़ी हैं!

    जुदा थे हम तो मयस्सर थीं क़ुर्बतें कितनी,बहम हुए तो पड़ी हैं जुदाइयाँ क्या क्या| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 3rd Oct 2024

    तुम आश्ना थे तो !

    न अब रक़ीब न नासेह न ग़म-गुसार कोई,तुम आश्ना थे तो थीं आश्नाइयाँ क्या क्या| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 3rd Oct 2024

    मेरी कुछ और रचनाएं-7    

    एक बार फिर से कुछ पुरानी रचनाएं मिल गईं सोचा इनको भी ढोल पीट लेता हूँ, क्योंकि बहुत समय पहले 1980 में दिल्ली छोड़ दी थी और रचनाकर्म भी लगभग छूट ही गया था| अधिकतर सुदूर प्रोजेक्ट्स में रहा और अब 7 से अधिक वर्षों से गोवा में रह रहा हूँ, जहां साहित्यिक सपोर्ट और…

  • 2nd Oct 2024

    उस में होगी ख़ामी भी!

    ऐसा तो मुमकिन ही नहीं है चाँद में कोई दाग़ न हो,जिस में होगी कुछ भी ख़ूबी उस में होगी ख़ामी भी| क़ैसर शमीम

  • 2nd Oct 2024

    अंदर से है खिंचाव!

    मेरे अहद के इंसानों को पढ़ लेना कोई खेल नहीं, ऊपर से है मेल-मोहब्बत, अंदर से है खिंचाव बहुत| क़ैसर शमीम

  • 2nd Oct 2024

    छुपे हुए उलझाव!

    अपने-आप में उलझी हुई इक दुनिया है हर शख़्स यहाँ,सुलझे हुए ज़ेहनों में भी हैं छुपे हुए उलझाव बहुत| क़ैसर शमीम

  • 2nd Oct 2024

    जिसमें नहीं घुमाव!

    सोच का है ये फेर कि यारो पेच-ओ-ख़म की दुनिया में,ढूँड रहे हो ऐसा रस्ता जिस में नहीं घुमाव बहुत| क़ैसर शमीम

  • 2nd Oct 2024

    बहके से बादल हैं!

    बहके बहके से बादल हैं क्या जाने ये जाएँ किधर,बदली हुई हवाओं का है उन पर आज दबाव बहुत| क़ैसर शमीम

  • 2nd Oct 2024

    टकराव बहुत!

    होने लगे हैं रस्ते रस्ते, आपस के टकराव बहुत,एक साथ के चलने वालों में भी है अलगाव बहुत| क़ैसर शमीम

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