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ख़लिश से छुटकारा!
मैं पा सका न कभी इस ख़लिश से छुटकारा,वो मुझ से जीत भी सकता था जाने क्यूँ हारा जावेद अख़्तर
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मित्रता और पवित्रता!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी में अपने किस्म के अनूठे कवि स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की यह कविता – आडम्बर मेंसमाप्त न होने पाएपवित्रता और समाप्त न…
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मेरे तरफ़-दार से हैं!
जब से वो अहल-ए-सियासत में हुए हैं शामिल,कुछ अदू के हैं तो कुछ मेरे तरफ़-दार से हैं| गुलज़ार
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हम उसी बाज़ार से हैं!
रूह से छीले हुए जिस्म जहाँ बिकते हैं,हम को भी बेच दे हम भी उसी बाज़ार से हैं| गुलज़ार
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वक़्त के तीर तो!
वक़्त के तीर तो सीने पे सँभाले हम ने,और जो नील पड़े हैं तिरी गुफ़्तार से हैं| गुलज़ार
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लोग पानी का कफ़न!
चढ़ते सैलाब में साहिल ने तो मुँह ढाँप लिया,लोग पानी का कफ़न लेने को तय्यार से हैं| गुलज़ार
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नाख़ुदा देख रहा है!
नाख़ुदा देख रहा है कि मैं गिर्दाब में हूँ,और जो पुल पे खड़े लोग हैं अख़बार से हैं| गुलज़ार
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पत्तों में हलचल है!
पेड़ के पत्तों में हलचल है ख़बर-दार से हैं,शाम से तेज़ हवा चलने के आसार से हैं| गुलज़ार