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मेरी क्या औक़ात!
क़ातिल भी मक़्तूल भी दोनों नाम ख़ुदा का लेते थे,कोई ख़ुदा है तो वो कहाँ था मेरी क्या औक़ात लिखूँ| जावेद अख़्तर
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तख़्त की ख़्वाहिश !
तख़्त की ख़्वाहिश लूट की लालच कमज़ोरों पर ज़ुल्म का शौक़,लेकिन उन का फ़रमाना है मैं इन को जज़्बात लिखूँ| जावेद अख़्तर
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कैसे वो सदमात लिखूँ!
किस किस की आँखों में देखे मैं ने ज़हर बुझे ख़ंजर,ख़ुद से भी जो मैं ने छुपाए कैसे वो सदमात लिखूँ| जावेद अख़्तर
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जब भी !
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादक मण्डल में शामिल रहे स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सर्वेश्वर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की यह कविता – जब…
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उनको बारात लिखूँ!
ग़म नहीं लिक्खूँ क्या मैं ग़म को जश्न लिखूँ क्या मातम को,जो देखे हैं मैं ने जनाज़े क्या उन को बारात लिखूँ| जावेद अख़्तर
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कसीली बात लिखूँ!
किन लफ़्ज़ों में इतनी कड़वी इतनी कसीली बात लिखूँ,शे’र की मैं तहज़ीब बना हूँ या अपने हालात लिखूँ| जावेद अख़्तर
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मगर न छोड़ेंगे लोग!
वो साँप छोड़ दे डसना ये मैं भी कहता हूँ,मगर न छोड़ेंगे लोग उस को गर न फुन्कारा| जावेद अख़्तर
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खुले थे पर तो मिरा!
जो पर समेटे तो इक शाख़ भी नहीं पाई,खुले थे पर तो मिरा आसमान था सारा| जावेद अख़्तर
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रक्खा हुआ ये अँगारा!
किसी की आँख से टपका था इक अमानत है,मिरी हथेली पे रक्खा हुआ ये अँगारा| जावेद अख़्तर