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जिस मृग पर कस्तूरी है!
आज एक बार फिर मैं, मेरे लिए गुरुतुल्य रहे, मधुर गीतों और मधुर व्यवहार के धनी, हिन्दी नवगीत के श्रेष्ठ हस्ताक्षर स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| बेचैन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का यह…
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है किताब-ए-ज़िंदगी!
अव्वल-ओ-आख़िर के कुछ औराक़ मिलते ही नहीं,है किताब-ए-ज़िंदगी बे-इब्तिदा बे-इंतिहा| कृष्ण बिहारी नूर
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ख़त्म होता ही नहीं!
इक तरफ़ क़ानून है और इक तरफ़ इंसान है,ख़त्म होता ही नहीं जुर्म-ओ-सज़ा का सिलसिला| कृष्ण बिहारी नूर
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मैं समुंदर पी गया!
उस की धुन में हर तरफ़ भागा किया दौड़ा किया,एक बूँद अमृत की ख़ातिर मैं समुंदर पी गया| कृष्ण बिहारी नूर
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कंगन दिलाने के लिए!
मैं ‘ज़फ़र’ ता-ज़िंदगी बिकता रहा परदेस में,अपनी घर-वाली को इक कंगन दिलाने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी
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मैं नए घर में बहुत!
छत टपकती थी अगरचे फिर भी आ जाती थी नींद,मैं नए घर में बहुत रोया पुराने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी
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आसमाँ ऐसा भी क्या!
आसमाँ ऐसा भी क्या ख़तरा था दिल की आग से, इतनी बारिश एक शोले को बुझाने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी
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आँसू वन्दनवार!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी नवगीत के अनूठे हस्ताक्षर स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| रंजक जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत – तुम आए, बोझिल पलकों केआँसू वन्दनवार हो गएरूप-राशि दर्पण भर…
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इक तबस्सुम जो था!
वक़्त होंटों से मिरे वो भी खुरच कर ले गया,इक तबस्सुम जो था दुनिया को दिखाने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी