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ख़्वाब तो ख़्वाब थे!
ख़्वाब तो ख़्वाब थे आँखों में कहाँ रुक जाते,वो दबे पाँव उन्हें भी तो चुराने निकले| रज़ा अमरोहवी
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छोड़ कर वहम!
छोड़ कर वहम-ओ-गुमाँ हुस्न-ए-यकीं तक पहुँचो,पर यक़ीं से भी कभी वहम-ओ-गुमाँ तक आओ| अली सरदार जाफ़री
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लो वो सदियों के!
लो वो सदियों के जहन्नुम की हदें ख़त्म हुई,अब है फ़िर्दौस ही फ़िर्दौस जहाँ तक आओ| अली सरदार जाफ़री
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घर – रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत…
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फूल के गिर्द फिरो!
फूल के गिर्द फिरो बाग़ में मानिन्द-ए-नसीम,मिस्ल-ए-परवाना किसी शम-ए-तपाँ तक आओ| अली सरदार जाफ़री
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तेग़ की तरह चलो!
तेग़ की तरह चलो छोड़ के आग़ोश-ए-नियाम,तीर की तरह से आग़ोश-ए-कमाँ तक आओ| अली सरदार जाफ़री
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फिर ये देखो कि!
फिर ये देखो कि ज़माने की हवा है कैसी,साथ मेरे मेरे फ़िर्दौस-ए-जवाँ तक आओ| अली सरदार जाफ़री
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मेरी नज़रों से गुज़र!
मैं जहाँ तुम को बुलाता हूँ वहाँ तक आओ,मेरी नज़रों से गुज़र कर दिल-ओ-जाँ तक आओ| अली सरदार जाफ़री
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कोई नग़्मा ही नहीं!
जाने किस रंग से आई है गुलशन में बहार,कोई नग़्मा ही नहीं शोर-ए-सिलासिल के सिवा| अली सरदार जाफ़री