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दिल से निकली है तो!
बिखरी इक बार तो हाथ आई है कब मौज-ए-शमीम,दिल से निकली है तो कब लब पे फ़ुग़ाँ ठहरी है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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झण्डे रह जायँगे!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मालवीय जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का यह नवगीत – झण्डे रह जायँगे, आदमी नहीं,इसलिए हमें सहेज लो, ममी, सही । जीवित…
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वस्ल की शब थी तो!
वस्ल की शब थी तो किस दर्जा सुबुक गुज़री थी,हिज्र की शब है तो क्या सख़्त गिराँ ठहरी है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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वही शीरीं का दहन!
है वही आरिज़*-ए-लैला वही शीरीं का दहन,निगह-ए-शौक़ घड़ी भर को जहाँ ठहरी है| *Cheeks फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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आज तक शैख़ के!
आज तक शैख़ के इकराम में जो शय थी हराम,अब वही दुश्मन-ए-दीं राहत-ए-जाँ ठहरी है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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जो भी चल निकली!
अब वही हर्फ़-ए-जुनूँ सब की ज़बाँ ठहरी है,जो भी चल निकली है वो बात कहाँ ठहरी है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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इक सुख़न और कि!
इक सुख़न और कि फिर रंग-ए-तकल्लुम* तेरा,हर्फ़-ए-सादा को इनायत करे ए’जाज़ का रंग| *Talking, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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दिल ने लय बदली तो!
चंग ओ नय* रंग पे थे अपने लहू के दम से,दिल ने लय बदली तो मद्धम हुआ हर साज़ का रंग|*Music and Dance फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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बाहर खेती-बारी रख!
आज एक बार फिर मैं, विख्यात कवि एवं राजनेता श्री उदयप्रताप सिंह जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| उदयप्रताप जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री उदयप्रताप सिंह जी कि यह ग़ज़ल – बाहर खेती-बारी रखआँगन में फुलवारी रख थोड़ी दुनिया दारी रखप्यार मुहब्बत जारी…
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शीशा-ए-मय में!
बे-पिए हूँ कि अगर लुत्फ़ करो आख़िर-ए-शब, शीशा-ए-मय में ढले सुब्ह के आग़ाज़ का रंग| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़