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जो मिटा भी न सकूँ!
बेवफ़ा लिखते हैं वो अपने क़लम से मुझ को,ये वो क़िस्मत का लिखा है जो मिटा भी न सकूँ| अमीर मीनाई
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लाख करूँगा सज्दे!
नक़्श-ए-पा देख तो लूँ लाख करूँगा सज्दे,सर मिरा अर्श नहीं है जो झुका भी न सकूँ| अमीर मीनाई
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सुना भी न सकूँ!
ज़ब्त कम-बख़्त ने याँ आ के गला घोंटा है,कि उसे हाल सुनाऊँ तो सुना भी न सकूँ| अमीर मीनाई
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जो जीवन की धूल चाट कर!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय केदारनाथ अग्रवाल जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| केदारनाथ अग्रवाल जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय केदारनाथ अग्रवाल जी की यह कविता – जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ हैतूफ़ानों से लड़ा…
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कुछ ये मेहंदी नहीं!
डाल के ख़ाक मेरे ख़ून पे क़ातिल ने कहा, कुछ ये मेहंदी नहीं मेरी कि छुपा भी न सकूँ| अमीर मीनाई
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जिसे पा भी न सकूँ!
उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ,ढूँडने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ| अमीर मीनाई
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हुज़ूर आहिस्ता
वो बेदर्दी से सर काटें ‘अमीर’ और मैं कहूँ उन से,हुज़ूर आहिस्ता आहिस्ता जनाब आहिस्ता आहिस्ता| अमीर मीनाई
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सवाल-ए-वस्ल पर!
सवाल-ए-वस्ल पर उन को अदू का ख़ौफ़ है इतना,दबे होंटों से देते हैं जवाब आहिस्ता आहिस्ता| अमीर मीनाई
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अब तो सोने दो!
शब-ए-फ़ुर्क़त का जागा हूँ फ़रिश्तो अब तो सोने दो,कभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब आहिस्ता आहिस्ता| अमीर मीनाई
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शबाब आहिस्ता!
जवाँ होने लगे जब वो तो हम से कर लिया पर्दा,हया यक-लख़्त आई और शबाब आहिस्ता आहिस्ता| अमीर मीनाई