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हुआ ख़ाली सदाओं से!
उगा सब्ज़ा दर-ओ-दीवार पर आहिस्ता आहिस्ता,हुआ ख़ाली सदाओं से नगर आहिस्ता आहिस्ता| मुनीर नियाज़ी
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याद अक्सर वो हमें !
हम पे हो जाएँ न कुछ और भी रातें भारी,याद अक्सर वो हमें अब सर-ए-शाम आते हैं| क़तील शिफ़ाई
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हम न चाहें तो!
हम न चाहें तो कभी शाम के साए न ढलें,हम तड़पते हैं तो सुब्हों के सलाम आते हैं| क़तील शिफ़ाई
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उन को ऐसे कई!
ज़िंदगी बन के वो चलते हैं मिरी साँस के साथ,उन को ऐसे कई अंदाज़-ए-ख़िराम आते हैं| क़तील शिफ़ाई
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प्यास मिट जाए तो!
उन की आँखों से रखे क्या कोई उम्मीद-ए-करम,प्यास मिट जाए तो गर्दिश में वो जाम आते हैं| क़तील शिफ़ाई
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बीते दिन!
आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय कैलाश गौतम जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| कैलाश जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कैलाश गौतम जी की यह कविता – बीते दिनमैं भूल नहीं पाता,था कोई जोमुझे देखकरमई जून की तेज़ धूप मेंमेरे आगे हो…
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सिर्फ़ आँसू जहाँ!
प्यार की राह में ऐसे भी मक़ाम आते हैं,सिर्फ़ आँसू जहाँ इंसान के काम आते हैं| क़तील शिफ़ाई
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मुख़्तसर न कर दे!
‘क़तील’ ये वस्ल के ज़माने हसीन भी हैं तवील भी हैं,मगर लगा है ये दिल को धड़का इन्हें कोई मुख़्तसर न कर दे| क़तील शिफ़ाई
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दामन तर न कर दे!
सताया जिस को हमेशा तू ने सदा अकेला जो छुप के रोया,वो दिल-जला अपने आँसुओं से तुम्हारा दामन भी तर न कर दे| क़तील शिफ़ाई