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तो रास्ता ही न हो!
न जा कि इस से परे दश्त-ए-मर्ग हो शायद,पलटना चाहें वहाँ से तो रास्ता ही न हो| मुनीर नियाज़ी
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जो तैरता ही न हो!
ज़मीं के गिर्द भी पानी ज़मीं की तह में भी,ये शहर जम के खड़ा है जो तैरता ही न हो| मुनीर नियाज़ी
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प्रस्तुत!
आज मैं हिन्दी की श्रेष्ठ कवियित्री स्वर्गीया कीर्ति चौधरी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| यह कविता अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक में सम्मिलित थी| कीर्ति जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीया कीर्ति चौधरी जी की यह कविता – मैं प्रस्तुत हूँ,इन कई…
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दिखाई देता है जो!
निगाह-ए-आईना मालूम अक्स ना-मालूम, दिखाई देता है जो असल में छुपा ही न हो| मुनीर नियाज़ी
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कहीं हवा ही न हो!
सफ़र में है जो अज़ल से ये वो बला ही न हो,किवाड़ खोल के देखो कहीं हवा ही न हो| मुनीर नियाज़ी
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कि हरकत तेज़-तर है!
‘मुनीर’ इस मुल्क पर आसेब का साया है या क्या है,कि हरकत तेज़-तर है और सफ़र आहिस्ता आहिस्ता| मुनीर नियाज़ी
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मिरे बाहर फ़सीलें थीं!
मिरे बाहर फ़सीलें थीं गुबार-ए-ख़ाक-ओ-बाराँ की,मिली मुझ को तिरे ग़म की ख़बर आहिस्ता आहिस्ता| मुनीर नियाज़ी
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साँप ने जिस्मों में!
चमक ज़र की उसे आख़िर मकान-ए-ख़ाक में लाई,बनाया साँप ने जिस्मों में घर आहिस्ता आहिस्ता| मुनीर नियाज़ी
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सुस्त था मंज़र!
बहुत ही सुस्त था मंज़र लहू के रंग लाने का,निशाँ आख़िर हुआ ये सुर्ख़-तर आहिस्ता आहिस्ता| मुनीर नियाज़ी
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हिले ठंडी हवाओं में!
घिरा बादल ख़मोशी से ख़िज़ाँ-आसार बाग़ों पर, हिले ठंडी हवाओं में शजर आहिस्ता आहिस्ता| मुनीर नियाज़ी