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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 9th Nov 2024

    आँधियाँ आईं तो !

    आँधियाँ आईं तो सब लोगों को मा’लूम हुआ,परचम-ए-ख़्वाब ज़माने में निगूँ कितना है| शहरयार

  • 9th Nov 2024

    नोक-ए-ख़ंजर ही!

    दिल में उतरेगी तो पूछेगी जुनूँ कितना है,नोक-ए-ख़ंजर ही बताएगी कि ख़ूँ कितना है| शहरयार

  • 9th Nov 2024

    बे-सम्त मंज़िलों ने!

    बे-सम्त मंज़िलों ने बुलाया है फिर हमें,सन्नाटे फिर बिछाने लगी रास्तों में रात| शहरयार

  • 9th Nov 2024

    हमको शुमार करती!

    आँखों को सब की नींद भी दी ख़्वाब भी दिए,हम को शुमार करती रही दुश्मनों में रात| शहरयार

  • 9th Nov 2024

    वो दरिया वो आबशार!

    वो खुरदुरी चटानें वो दरिया वो आबशार,सब कुछ समेट ले गई अपने परों में रात| शहरयार

  • 9th Nov 2024

    खराब कवि-1

    आज मैं अपने एक पुराने मित्र और हिन्दी के श्रेष्ठ कवि श्री कृष्ण कल्पित जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| कल्पित जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री कृष्ण कल्पित जी की यह कविता – कविता अच्छी भले न होलेकिन उसे ख़राब नहीं होना चाहिए…

  • 8th Nov 2024

    जब रगों में रात!

    कुछ भी दिखाई देता नहीं दूर दूर तक, चुभती है सूइयों की तरह जब रगों में रात| शहरयार

  • 8th Nov 2024

    यूँ बूँद बूँद उतरी!

    पहले नहाई ओस में फिर आँसुओं में रात,यूँ बूँद बूँद उतरी हमारे घरों में रात| शहरयार

  • 8th Nov 2024

    मज़ा तो जब है कि!

    कटी है जिस के ख़यालों में उम्र अपनी ‘मुनीर’,मज़ा तो जब है कि उस शोख़ को पता ही न हो| मुनीर नियाज़ी

  • 8th Nov 2024

    बुत का जी बुरा न हो!

    मैं इस ख़याल से जाता नहीं वतन की तरफ़,कि मुझ को देख के उस बुत का जी बुरा ही न हो| मुनीर नियाज़ी

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