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आँधियाँ आईं तो !
आँधियाँ आईं तो सब लोगों को मा’लूम हुआ,परचम-ए-ख़्वाब ज़माने में निगूँ कितना है| शहरयार
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नोक-ए-ख़ंजर ही!
दिल में उतरेगी तो पूछेगी जुनूँ कितना है,नोक-ए-ख़ंजर ही बताएगी कि ख़ूँ कितना है| शहरयार
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बे-सम्त मंज़िलों ने!
बे-सम्त मंज़िलों ने बुलाया है फिर हमें,सन्नाटे फिर बिछाने लगी रास्तों में रात| शहरयार
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हमको शुमार करती!
आँखों को सब की नींद भी दी ख़्वाब भी दिए,हम को शुमार करती रही दुश्मनों में रात| शहरयार
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खराब कवि-1
आज मैं अपने एक पुराने मित्र और हिन्दी के श्रेष्ठ कवि श्री कृष्ण कल्पित जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| कल्पित जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री कृष्ण कल्पित जी की यह कविता – कविता अच्छी भले न होलेकिन उसे ख़राब नहीं होना चाहिए…
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यूँ बूँद बूँद उतरी!
पहले नहाई ओस में फिर आँसुओं में रात,यूँ बूँद बूँद उतरी हमारे घरों में रात| शहरयार
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मज़ा तो जब है कि!
कटी है जिस के ख़यालों में उम्र अपनी ‘मुनीर’,मज़ा तो जब है कि उस शोख़ को पता ही न हो| मुनीर नियाज़ी
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बुत का जी बुरा न हो!
मैं इस ख़याल से जाता नहीं वतन की तरफ़,कि मुझ को देख के उस बुत का जी बुरा ही न हो| मुनीर नियाज़ी