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मैं रहूँ या न रहूँ!
मैं रहूँ या न रहूँ नाम रहेगा मेरा,ज़िंदगी उम्र में कुछ मुझ से बड़ी लगती है| मुनव्वर राना
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रात ख़ुद चाँद सितारों!
तू मिरे साथ अगर है तो अंधेरा कैसा,रात ख़ुद चाँद सितारों से जड़ी लगती है| मुनव्वर राना
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जिस तरह घड़ी लगती!
ख़ुशनुमा लगते हैं दिल पर तिरे ज़ख़्मों के निशाँ,बीच दीवार में जिस तरह घड़ी लगती है| मुनव्वर राना
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अभी दुनिया हमें!
हम भी अपने को बदल डालेंगे रफ़्ता रफ़्ता,अभी दुनिया हमें जन्नत से बड़ी लगती है| मुनव्वर राना
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तू जहाँ होता है!
सारी दौलत तिरे क़दमों में पड़ी लगती है,तू जहाँ होता है क़िस्मत भी गड़ी लगती है| मुनव्वर राना
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उस पार!
आज एक बार फिर मैं अपने समय के हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और मंचों पर धूम मचाने वाले स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| नेपाली जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की यह कविता –…
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फ़ासला यूँ कितना है!
एक ही मिट्टी से हम दोनों बने हैं लेकिन, तुझ में और मुझ में मगर फ़ासला यूँ कितना है| शहरयार
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वो जो प्यासे थे!
वो जो प्यासे थे समुंदर से भी प्यासे लौटे,उन से पूछो कि सराबों में फ़ुसूँ कितना है| शहरयार
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वो ये क्या जानें!
जम्अ करते रहे जो अपने को ज़र्रा ज़र्रा,वो ये क्या जानें बिखरने में सुकूँ कितना है| शहरयार