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वो हम नहीं थे मगर!
वो आईना तो नहीं था पर आईने सा था,वो हम नहीं थे मगर यार हू-ब-हू हम थे| राहत इंदौरी
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ख़ुदा का शुक्र कि !
दिनों के बा’द अचानक तुम्हारा ध्यान आया,ख़ुदा का शुक्र कि उस वक़्त बा-वज़ू हम थे| राहत इंदौरी
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एक आत्मीय अनुरोध!
आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि श्री नंद भारद्वाज जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| नंद जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री नंद भारद्वाज जी की यह कविता – कहवाघरों की सर्द बहसों मेंअपने को खोने से बेहतर हैघर में बीमार बीबी के पास बैठो,आईने…