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उसी तरह की झिझक!
गुनाह भी कोई जैसे करे डरे भी बहुत,उसी तरह की झिझक उस की बात बात में है| कृष्ण बिहारी नूर
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उसी तरह वो परेशाँ !
कि जैसे झूट कई झूट के सहारे ले,उसी तरह वो परेशाँ तकल्लुफ़ात में है| कृष्ण बिहारी नूर
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उसी तरह की महक!
कि जैसे बू-ए-वफ़ा ख़ुद-सुपुर्दगी में मिले,उसी तरह की महक उस की इल्तिफ़ात में है| कृष्ण बिहारी नूर
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कि जैसे वक़्त गुज़रने!
कि जैसे वक़्त गुज़रने का कुछ न हो एहसास,उसी तरह वो शरीक-ए-सफ़र हयात में है| कृष्ण बिहारी नूर
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उसी तरह कोई सूरत!
कि जैसे संग के सीने में कोई बुत है निहाँ, उसी तरह कोई सूरत तख़य्युलात में है| कृष्ण बिहारी नूर
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इसी तरह वो रवाँ !
कि जैसे जिस्म की रग रग में दौड़ता है लहू,इसी तरह वो रवाँ अरसा-ए-हयात में है| कृष्ण बिहारी नूर
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उसी तरह वो छुपा!
मैं जिस हुनर से हूँ पोशीदा अपनी ग़ज़लों में,उसी तरह वो छुपा सारी काएनात में है| कृष्ण बिहारी नूर
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वो सब वुजूद में है!
दिखाई दे न कभी ये तो मुम्किनात में है,वो सब वुजूद में है जो तसव्वुरात में है| कृष्ण बिहारी नूर
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हम बचेंगे अगर !
आज मैं अपने एक मित्र और हिन्दी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय नवीन सागर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| नवीन जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नवीन सागर जी की यह कविता – एक बच्चीअपनी गुदगुदी हथेलीदेखती हैऔर धरती पर मारती हैलार और हँसी…