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आँखें हैं हमारी नम !
इस बार मिले हैं ग़म कुछ और तरह से भी,आँखें हैं हमारी नम कुछ और तरह से भी| हस्तीमल हस्ती
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मैं लखनऊ हो जाऊँ!
नए मिज़ाज के शहरों में जी नहीं लगता,पुराने वक़्तों का फिर से मैं लखनऊ हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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अगर मैं ज़ख़्म की!
कमी ज़रा सी भी मुझ में न कोई रह जाए,अगर मैं ज़ख़्म की सूरत हूँ तो रफ़ू हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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मैं भी सुर्ख़-रू हो जाऊँ!
मिरी हथेली पे होंटों से ऐसी मोहर लगा,कि उम्र-भर के लिए मैं भी सुर्ख़-रू हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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कभी जब याद आ जाते!
आज मैं हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ आलोचक तथा हिन्दी कवि स्वर्गीय नामवर सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| नामवर जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नामवर सिंह जी का यह नवगीत – कभी जब याद आ जाते नयन को घेर लेते घन,स्वयं…
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वो आइना है तो मैं!
मुझे पता तो चले मुझ में ऐब हैं क्या क्या,वो आइना है तो मैं उस के रू-ब-रू हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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मैं उस की आँखों में!
बड़ा हसीन तक़द्दुस है उस के चेहरे पर,मैं उस की आँखों में झाँकूँ तो बा-वज़ू हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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किसी ग़रीब की!
किसी ग़रीब की बरसों की आरज़ू हो जाऊँ,मैं इस सुरंग से निकलूँ तो आब-जू हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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ख़ौफ़ में डूबे हुए!
ख़ौफ़ में डूबे हुए शहर की क़िस्मत है यही,मुंतज़िर रहता है हर शख़्स कि क्या होता है| मुनव्वर राना