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आदमी को साहब-ए!
झूट बोला है तो क़ाएम भी रहो उस पर ‘ज़फ़र‘, आदमी को साहब-ए-किरदार होना चाहिए| ज़फ़र इक़बाल
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दोस्ती के नाम पर!
दोस्ती के नाम पर कीजे न क्यूँकर दुश्मनी,कुछ न कुछ आख़िर तरीक़-ए-कार होना चाहिए| ज़फ़र इक़बाल
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दुश्वार होना चाहिए!
बात पूरी है अधूरी चाहिए ऐ जान-ए-जाँ,काम आसाँ है इसे दुश्वार होना चाहिए| ज़फ़र इक़बाल
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डूब कर मरना भी!
डूब कर मरना भी उसलूब-ए-मोहब्बत हो तो हो,वो जो दरिया है तो उस को पार होना चाहिए| ज़फ़र इक़बाल
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ख़्वाब की ताबीर पर!
ख़्वाब की ताबीर पर इसरार है जिन को अभी,पहले उन को ख़्वाब से बेदार होना चाहिए| ज़फ़र इक़बाल
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ख़ामुशी अच्छी नहीं!
ख़ामुशी अच्छी नहीं इंकार होना चाहिए, ये तमाशा अब सर-ए-बाज़ार होना चाहिए| ज़फ़र इक़बाल
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नानी!
आज मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि श्री प्रयाग शुक्ल जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| शुक्ल जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री प्रयाग शुक्ल जी की यह कविता – मेरी बेटी ने नहीं देखा मेरी नानी को ।(नानी की कोई तस्वीर भी नहीं है मेरे…
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मंज़िल ने दिए ताने!
मंज़िल ने दिए ताने रस्ते भी हँसे लेकिन, चलते रहे अक्सर हम कुछ और तरह से भी| हस्तीमल हस्ती
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जलता है किसी का ग़म!
शो’ला भी नहीं उठता काजल भी नहीं बनता,जलता है किसी का ग़म कुछ और तरह से भी| हस्तीमल हस्ती