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फ़लक पे काली घटा!
कभी कभी तो बरसते हुए भी देखा है,फ़लक पे काली घटा से लिखा हुआ इक नाम| कृष्ण बिहारी नूर
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अंतराल!
आज मैं एक श्रेष्ठ आधुनिक कवि स्वर्गीय मंगलेश डबराल जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। डबराल जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मंगलेश डबराल जी की यह कविता – हरा पहाड़ रात मेंसिरहाने खड़ा हो जाता हैशिखरों से टकराती हुई तुम्हारी आवाज़सीलन-भरी घाटी में…
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अजीब बात है पढ़िए!
अजीब बात है पढ़िए तो हर्फ़ उड़ने लगें,बदन बदन पे क़बा से लिखा हुआ इक नाम| कृष्ण बिहारी नूर
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चमकता रहता है जब!
चमकता रहता है जब तक कुरेदी जाए न राख,चिता पे दस्त-ए-फ़ना से लिखा हुआ इक नाम| कृष्ण बिहारी नूर
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ख़ुशबुओं के लब पर!
जो सुन सको तो सुनो ख़ुशबुओं के लब पर है,गुलों पे बाद-ए-सबा से लिखा हुआ इक नाम| कृष्ण बिहारी नूर
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न पढ़ सकेगा बशर!
हर इक की अपनी ज़बाँ है न पढ़ सकेगा बशर,ज़मीं पे आब-ओ-हवा से लिखा हुआ इक नाम| कृष्ण बिहारी नूर
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लिखा हुआ इक नाम!
ख़मोशियों में सदा से लिखा हुआ इक नाम,सुनो है दस्त-ए-दुआ से लिखा हुआ इक नाम| कृष्ण बिहारी नूर
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मीर-ए-कारवाँ मैं हूँ!
गर्द-ए-राह की सूरत साँस साँस है ऐ ‘नूर’,मीर-ए-कारवाँ मैं हूँ क़ाफ़िला है ख़्वाबों का| कृष्ण बिहारी नूर
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नश्शे का ये आलम है!
नश्शे का ये आलम है सच ही सच लगे सब कुछ,ज़िंदगी की सहबा है मय-कदा है ख़्वाबों का| कृष्ण बिहारी नूर
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अपनी अपनी ताबीरें!
अपनी अपनी ताबीरें ढूँढता है हर चेहरा,चेहरा चेहरा पढ़ लीजे तज़्किरा है ख़्वाबों का| कृष्ण बिहारी नूर