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ख़ुद को फ़रेब दो!
ख़ुद को फ़रेब दो कि न हो तल्ख़ ज़िंदगी,हर संग-दिल को जान-ए-वफ़ा कह लिया करो| क़तील शिफ़ाई
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ग़म-ख़्वार तुम्हारे!
तज दिया तुम ने दर-ए-यार भी उकता के ‘फ़राज़’,अब कहाँ ढूँढने ग़म-ख़्वार तुम्हारे जाएँ| अहमद फ़राज़
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जी जान से हारे जाएँ!
हम कि नादान जुआरी हैं सभी जानते हैं,दिल की बाज़ी हो तो जी जान से हारे जाएँ| अहमद फ़राज़
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दुल्हन को सँवारे जाएँ!
बाप लर्ज़ां है कि पहुँची नहीं बारात अब तक,और हम-जोलियाँ दुल्हन को सँवारे जाएँ| अहमद फ़राज़
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इतना प्यार न देना मुझको!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय मधुर शास्त्री जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। मधुर शास्त्री जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मधुर शास्त्री जी का यह गीत – इतना प्यार न देना मुझको दुःख के बोल न मैं सुन पाऊँ यों मेरे जीवन…
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यूँही मर मर के जिएँ!
यूँही मर मर के जिएँ वक़्त गुज़ारे जाएँ,ज़िंदगी हम तिरे हाथों से न मारे जाएँ| अहमद फ़राज़
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सिलसिला टूटा नहीं है!
जिस को भी चाहा उसे शिद्दत से चाहा है ‘फ़राज़’,सिलसिला टूटा नहीं है दर्द की ज़ंजीर का| अहमद फ़राज़