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स्वप्न!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी कोई रचना मैंने पहले शेयर नहीं की है। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद सिंह जी की यह कविता – स्वप्न…कच्ची नींद का पाहुन,बेवफ़ा है,– दीठ से…भागेपीठ-पीछे कोसने कोबंद पलकों मेंसदा जागे,एक खुशबू से बदल दे…
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रोने के बाद कुछ हमें !
पलकों पे अब नहीं है वो पहला सा बार-ए-ग़म,रोने के बा’द कुछ हमें आराम भी तो है| क़तील शिफ़ाई
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आँखें हर इक हसीन!
आँखें हर इक हसीन की बे-फ़ैज़ तो नहीं,कुछ सागरों में बादा-ए-गुलफ़ाम भी तो है| क़तील शिफ़ाई
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अच्छा सही ‘क़तील’!
उस पर तुम्हारे प्यार का इल्ज़ाम भी तो है,अच्छा सही ‘क़तील’ प बदनाम भी तो है| क़तील शिफ़ाई
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जब दिल जले तो!
ले दे के अब यही है निशान-ए-ज़िया ‘क़तील’,जब दिल जले तो इस को दिया कह लिया करो| क़तील शिफ़ाई
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हर ज़ुल्म को रज़ा!
अपने लिए अब एक ही राह-ए-नजात है,हर ज़ुल्म को रज़ा-ए-ख़ुदा कह लिया करो| क़तील शिफ़ाई
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इंसान का अगर क़द!
इंसान का अगर क़द-ओ-क़ामत न बढ़ सके,तुम इस को नक़्स-ए-आब-ओ-हवा कह लिया करो| क़तील शिफ़ाई
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घटा कह लिया करो!
यारो ये दौर ज़ोफ़-ए-बसारत का दौर है,आँधी उठे तो उस को घटा कह लिया करो| क़तील शिफ़ाई
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सूनापन चहका चहका!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री यश मालवीय जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। यश जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री यश मालवीय जी का यह गीत – अभिवादन बादल-बादलख़बर लिये वन-उपवन कीकितने आशीर्वाद लियेपहली बरखा सावन की बरस-बरस हैं घन बरसेअब की भी…
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जितने सनम हैं!
गर चाहते हो ख़ुश रहें कुछ बंदगान-ए-ख़ास,जितने सनम हैं उन को ख़ुदा कह लिया करो| क़तील शिफ़ाई