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बहाने आ जाते हैं!
हम भी ‘मुनीर’ अब दुनिया-दारी कर के वक़्त गुज़ारेंगे,होते होते जीने के भी लाख बहाने आ जाते हैं| मुनीर नियाज़ी
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कैसे हैं वो लोग जिन्हें!
ज़े के रेशमी रुमालों को किस किस की नज़रों से छुपाएँ,कैसे हैं वो लोग जिन्हें ये राज़ छुपाने आ जाते हैं| मुनीर नियाज़ी
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रोग मिटाने आ जाते!
कौन सा वो जादू है जिस से ग़म की अँधेरी सर्द गुफा में,लाख निसाई साँस दिलों के रोग मिटाने आ जाते हैं| मुनीर नियाज़ी
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फूल चढ़ाने आ जाते!
जिन लोगों ने उन की तलब में सहराओं की धूल उड़ाई,अब ये हसीं उन की क़ब्रों पर फूल चढ़ाने आ जाते हैं| मुनीर नियाज़ी
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रंग पुराने आ जाते हैं!
दिन भर जो सूरज के डर से गलियों में छुप रहते हैं,शाम आते ही आँखों में वो रंग पुराने आ जाते हैं| मुनीर नियाज़ी
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जब भी घर की छत!
जब भी घर की छत पर जाएँ नाज़ दिखाने आ जाते हैं,कैसे कैसे लोग हमारे जी को जलाने आ जाते हैं| मुनीर नियाज़ी
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जो चाहा बना दिया!
मिरे पास ऐसा तिलिस्म है जो कई ज़मानों का इस्म है,उसे जब भी सोचा बुला लिया उसे जो भी चाहा बना दिया| मुनीर नियाज़ी