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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 22nd Dec 2024

    और धारा और है!

    मौज के मुड़ने में कितनी देर है,नाव डाली और धारा और है। परवीन शाकिर

  • 21st Dec 2024

    एक मुट्ठी रेत में कैसे!

    एक मुट्ठी रेत में कैसे रहे,इस समुंदर का किनारा और है। परवीन शाकिर

  • 21st Dec 2024

    शब वही लेकिन!

    शब वही लेकिन सितारा और है,अब सफ़र का इस्तिआ’रा और है। परवीन शाकिर

  • 21st Dec 2024

    बहाने आ जाते हैं!

    हम भी ‘मुनीर’ अब दुनिया-दारी कर के वक़्त गुज़ारेंगे,होते होते जीने के भी लाख बहाने आ जाते हैं| मुनीर नियाज़ी

  • 21st Dec 2024

    कैसे हैं वो लोग जिन्हें!

    ज़े के रेशमी रुमालों को किस किस की नज़रों से छुपाएँ,कैसे हैं वो लोग जिन्हें ये राज़ छुपाने आ जाते हैं| मुनीर नियाज़ी

  • 20th Dec 2024

    रोग मिटाने आ जाते!

    कौन सा वो जादू है जिस से ग़म की अँधेरी सर्द गुफा में,लाख निसाई साँस दिलों के रोग मिटाने आ जाते हैं| मुनीर नियाज़ी

  • 20th Dec 2024

    फूल चढ़ाने आ जाते!

    जिन लोगों ने उन की तलब में सहराओं की धूल उड़ाई,अब ये हसीं उन की क़ब्रों पर फूल चढ़ाने आ जाते हैं| मुनीर नियाज़ी

  • 20th Dec 2024

    रंग पुराने आ जाते हैं!

    दिन भर जो सूरज के डर से गलियों में छुप रहते हैं,शाम आते ही आँखों में वो रंग पुराने आ जाते हैं| मुनीर नियाज़ी

  • 20th Dec 2024

    जब भी घर की छत!

    जब भी घर की छत पर जाएँ नाज़ दिखाने आ जाते हैं,कैसे कैसे लोग हमारे जी को जलाने आ जाते हैं| मुनीर नियाज़ी

  • 20th Dec 2024

    जो चाहा बना दिया!

    मिरे पास ऐसा तिलिस्म है जो कई ज़मानों का इस्म है,उसे जब भी सोचा बुला लिया उसे जो भी चाहा बना दिया| मुनीर नियाज़ी

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