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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 20th Dec 2025

    एक मुद्दत से हैं!

    एक मुद्दत से हैं सफ़र में हम,घर में रह कर भी जैसे बेघर से| अज़हर इक़बाल

  • 20th Dec 2025

    तेरी जुदाई के डर से!

    मुझ को वहशत हुई मिरे घर से,रात तेरी जुदाई के डर से| अज़हर इक़बाल

  • 20th Dec 2025

    हम वो परवाने हैं!

    अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में मुकेश द्वारा फिल्म- दिल ने फिर याद किया के गीत का एक अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ जो मुकेश जी न गाया था- हम वो परवाने हैं जो शमआ का दम भरते हैं, हुस्न की आग में खामोश जला करते हैं। आशा है आपको…

  • 20th Dec 2025

    कब और क्यों- रवींद्रनाथ ठाकुर

    आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…

  • 19th Dec 2025

    मिलाते हुए मर जाते हैं

    हम हैं वो टूटी हुई कश्तियों वाले ‘ताबिश’,जो किनारों को मिलाते हुए मर जाते हैं। अब्बास ताबिश

  • 19th Dec 2025

    मोहब्बत की कहानी!

    ये मोहब्बत की कहानी नहीं मरती लेकिन,लोग किरदार निभाते हुए मर जाते हैं। अब्बास ताबिश

  • 19th Dec 2025

    उनके भी क़त्ल का!

    उन के भी क़त्ल का इल्ज़ाम हमारे सर है,जो हमें ज़हर पिलाते हुए मर जाते हैं। अब्बास ताबिश

  • 19th Dec 2025

    किस तरह लोग!

    किस तरह लोग चले जाते हैं उठ कर चुप-चाप,हम तो ये ध्यान में लाते हुए मर जाते हैं। अब्बास ताबिश

  • 19th Dec 2025

    हम तिरे शहर से!

    घर पहुँचता है कोई और हमारे जैसा,हम तिरे शहर से जाते हुए मर जाते हैं। अब्बास ताबिश

  • 19th Dec 2025

    निभाते हुए मर जाते हैं!

    हम हैं सूखे हुए तालाब पे बैठे हुए हंस,जो तअ’ल्लुक़ को निभाते हुए मर जाते हैं। अब्बास ताबिश

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